बेबाक: जब MOA को दरकिनार कर MDs एवं Chairman थोपे जा सकते हैं, विद्युत अभियन्ता के स्थान पर IT एवं Civil इन्जीनियर कार्य कर सकते हैं, अस्थाई निदेशक नियुक्त किये जा सकते हैं, तो निदेशकों के साक्षात्कार की औपचारिकता क्यों?

मित्रों नमस्कार! पिछले अंक में आपने पढ़ा कि किस प्रकार से वितरण कम्पनियों में निदेशक, प्रबन्ध निदेशक एवं अध्यक्ष पद भरने के लिये Memorandum of Article में दिये गये निर्देशों को दरकिनार करते हुये, प्रदेश के उर्जा निगमों में, बाहरी अधिकारी, निदेशक के रुप में लगातार थोपे जा रहे हैं। जब से उ0प्र0रा0वि0प0 के विघटन के उपरान्त वितरण कम्पनियों का गठन हुआ है, निरन्तर राजनीतिज्ञ एवं प्रशासनिक अधिकारी, वितरण कम्पनियों एवं पा0का0लि0 में शतरंज की बिसात बिछाकर, जनहित एवं उपभोक्ता देवो भवः की आड़ में भारत सरकार/प्रदेश सरकार द्वारा पोषित विभिन्न विद्युतिकरण एवं सुदृढ़ीकरण की योजनाओं के लिये प्राप्त जनता के धन का, बंदर बांट कर रहे हैं। जिसमें उर्जा निगमों के कर्मचारी एवं अधिकारियों की उपयोगिता सिर्फ और सिर्फ एक प्यादे भर की रह गई है। चाहे वो निदेशक ही क्यों न बन जाये।

सबसे दुखद पहलू यही है कि, उर्जा निगमों में आज नियमित अभियन्ताओं की अहमियत एवं उपयोगिता शून्य हो चुकी है। यहां एक प्रश्न उठता है कि क्या यह प्रबन्धन की एक सोची समझी नीति नहीं है, जिसके तहत उर्जा निगमों के अभियन्ताओ एवं कर्मचारियों को हतोत्साहित करने का हरसम्भव प्रयास किया जा रहा है। प्रत्येक विद्युतिकरण/प्रणाली सुदृढ़िकरण की योजनाओं के लिये अनुबन्धित PMA में नियुक्त, औसतन 25 वर्ष आयु के कोरे अभियन्ता, प्रबन्धन की गोद में पैर पर पैर रखकर बैठकर, विभाग के नियमित 30-30 वर्ष के अनुभवी अभियन्ताओं का मजाक उड़ा रहे हैं। जिसके कारण विभागीय कार्मिकों ने अपने ज्ञान-कौशल को उतारकर, खूंटी पर टांग दिया है और जैसा भी उच्चाधिकारी कहते हैं, वह हां जी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बोलते। क्योंकि बोलने का मतलब काला पानी जाना अथवा निलम्बित हो जाना है। जिसके मूल में है उर्जा निगमों के इन्जीनियरों को लगातार प्रताणित एवं हतोत्साहित कर उनके अन्दर की प्रतिभा एवं आत्मबल एवं आत्मविश्वास को कुचलना है। जिससे कि उन्हें नकारा घोषित कर, उर्जा निगमों का सौदा किया जा सके। यक्ष प्रश्न उठता है कि जब उर्जा निगमों में नियम एवं कायदों का कोई महत्व ही नहीं है।

प्रबन्धन के लिये IT Engineer, Civil Engineer & Electrical Engineer में कोई अन्तर नहीं है। अर्थात प्रबन्धन का यह सन्देश है कि उसके लिये योग्यता कोई महत्व नहीं रखती और वह दूसरे Cadre के Engineers से भी Electrical Engineering का कार्य ले सकता है। अभी तक वितरण निगमों में उपलब्ध अधिकारियों को कार्यभार देने के स्थान पर, प्रबन्धन द्वारा अपने पसंदीदा कनिष्ठ अभियन्ताओं को उच्च पद का अतिरिक्त कार्यभार दिलाया जाता रहा है। अब उसमें एक और अध्याय जुड़ गया है, अधीक्षण अभियन्ता को उनके अधीन कनिष्ठ पद अधिशासी अभियन्ता का अतिरिक्त कार्यभार दे दिया गया है। अर्थात विभागीय अधिकारियों की कोई अहमियत नहीं है। निदेशकों के चुनाव से पहले ही कुछ गिन्नी विजेताओं के नाम कानाफूसी शुरु हो गई है। सबसे ज्यादा दुखद यह है कि कार्मिक संगठन अपनी हठधर्मिता एवं निहित स्वार्थ के कारण शून्य की ओर अग्रसरित हो चुके हैं। परिणामतः प्रबन्धन भी बिना किसी विरोध के निरंकुश हो चुका है। यही कारण है कि बाहरी व्यक्ति का 15 वर्ष का कोरा अनुभव, विभागीय अधिकारियों के 30 वर्षों के विषमतः परिस्थितियों में कार्य करने के अनुभव पर भारी दिखाई दे रहा है। जोकि सीधे-सीधे विभागीय अधिकारियों के अपमान के समान है। जानकारी के अनुसार कुछ अस्थाई निदेशक भी नियुक्त किये जा चुके हैं।

यक्ष प्रश्न उठता है कि जो प्रबन्धन किसी भी कार्य में जरा सा भी विलम्ब होने पर, तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के लिये तत्पर दिखाई देता है, तो वह निदेशकों का कार्यकाल पूर्ण होने से पहले नये निदेशकों का चयन क्यों नहीं करवाता है। जिस प्रकार से MOA को दरकिनार करते हुये, प्रबन्ध निदेशक एवं अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है, उसी तरह निदेशकों को भी नियुक्त किया जा सकता है। यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि उर्जा निगमों में निदेशकों की आवश्यकता क्या है, क्या निदेशकों की उपयोगिता सिर्फ और सिर्फ निदेशक मण्डल में रबर स्टाम्प के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। जो स्वयं कोई भी निर्णय लेने हेतु सक्षम नहीं हैं। डिस्काम में प्रबन्ध निदेशक एवं पा0का0लि0 में अध्यक्ष का ही बोल-बाला है। जिनकी अनुमति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। एक बार फिर यह प्रश्न उठता है कि जब निदेशकों की हैसियत रबर स्टाम्प के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है तो निदेशक पद को पाने की होड़ क्यों लगी है और बाहरी अधिकारियों को अनुभव में 15 वर्ष की छूट क्यों दी गई है।

स्पष्ट है कि चयनित निदेशकों का मूल कार्य प्रबन्ध निदेशकों एवं अध्यक्ष महोदय द्वारा लिये गये निर्णयों पर आंख बन्द करके अपनी सहमति प्रदान करना मात्र है जिसके एवज में, विभिन्न समितियों का सदस्य बनना है। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है, क्रय समिति का सदस्य बनना। जिसके माध्यम से निवेश को गुणात्मक रुप में प्राप्त करना है। इसके अतिरिक्त निदेशकों की न तो कोई आवाज है और न ही कोई उपयोगिता है। बाहरी निदेशकों के लिये अनुभव में 15 वर्ष की छूट देकर उन्हें रिझाने के पीछे एकमात्र उद्देश्य है कि बाहरी अधिकारियों को उर्जा निगमों की कार्य पद्धति एवं कार्यशैली की कोई जानकारी न हो। क्योंकि बाहर से आये निदेशक जब तक विभाग की कार्य पद्धति समझेंगे, उनका 3 वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो जायेगा। जबकि विभागीय अभियन्ता, विभाग के कोने-कोने से अच्छी तरह से वाकिफ होता है, जिसके कारण किसी भी निर्णय की गोपनीयता छिपाये रखना जटिल है। अपने ही उर्जा निगमों अर्थात अपने ही घर में अधिकारियों की बस यही पहचान है। सीधे-सीधे शब्दों विभागीय अभियन्ता,नकारा एवं अयोग्य घोषित कर दिये गये हैं। प्रबन्धन द्वारा सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को मैराथन विडिओ कान्फ्रेन्सिंग में कुछ इस तरह से उलझाकर रखा हुआ है, कि वे न तो कुछ देख सकें और न ही कुछ समझ सकें। प्रबन्धन इस विषय पर विचार ही नहीं करना चाहता, कि जब तक इन्जीनियर, अपनी इन्जीनियरिंग के कार्य नहीं करेगा, तो उर्जा निगम किस प्रकार से आगे बढ़ेंगे।

स्पष्ट है कि स्थानान्तरण एवं नियुक्ती का योग्यता एवं उपयोगिता से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्थानान्तरण एवं नियुक्ती सिर्फ निहित स्वार्थ एवं हठधर्मिता का प्रमाण है। निहित स्वार्थ एवं हठधर्मिता के फलस्वरुप होने वाले स्थानान्तरण एवं नियुक्ती के कारण कार्मिक की निष्ठा, विभाग से ज्यादा सम्बन्धित व्यक्ति के प्रति हो जाती है और उसका मूल उद्देश्य निवेश से कई गुना ज्यादा प्राप्ति हो जाता है। जिससे कि वह भविष्य में सुगमता से निवेश कर सके और ससमय अपने लाईसेंस का नवीनीकरण करा सके। यही कारण है कि आज अधिकांश इन्जीनियर कार्य से ज्यादा, कार्य में अपनी हिस्सेदारी तलाशते फिर रहे हैं। जहां तक विद्युत सामग्री एवं कार्य की गुणवत्ता का प्रश्न उठता है तो इससे बढ़िया कोई उदाहरण नहीं हो सकता, कि जब इलेक्ट्रीकल इन्जीनियर के स्थान पर आई0टी0/सिविल इन्जीनियर सामग्री निरीक्षण का कार्य कर सकते है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्य में HT Insulator के स्थान पर LT Insulator कार्य करने लग जायें।
राष्ट्रहित में समर्पित! जय हिन्द!

– बी0के0 शर्मा, महासचिव PPEWA.

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