5 घंटे बिजली गुल… और जेई सस्पेंड! हाईकोर्ट ने लगाई रोक, पावर कॉरपोरेशन की कार्रवाई पर सख्त सवाल

हाईकोर्ट की फटकार के बाद भी सवालों में पावर कॉरपोरेशन की कार्रवाई

Writ-A No. 839/2026 | Vishwakarma Sharma, JE (वृन्दावन, लखनऊ) — 05.01.2026 के निलंबन पर 28.01.2026 को लखनऊ बेंच का स्टे

UPPCL MEDIA | विशेष रिपोर्ट

लखनऊ। बिजली आपूर्ति बाधित होने की घटना के बाद त्वरित कार्रवाई दिखाते हुए एक जूनियर इंजीनियर को निलंबित करने वाला पावर कॉरपोरेशन अब खुद न्यायालय की कसौटी पर है। इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ बेंच ने Writ-A No. 839/2026 में याचिकाकर्ता Vishwakarma Sharma, JE के 05.01.2026 के निलंबन आदेश पर 28.01.2026 को रोक (Stay) लगा दी।

विषय वृन्दावन, लखनऊ का है, जहां 04.01.2026 को संबंधित क्षेत्र में कई घंटे बिजली आपूर्ति बाधित रही। विभाग ने आरोप लगाया कि ड्यूटी के दौरान जेई 5–6 घंटे मौके पर उपलब्ध नहीं रहे, और इसे “आवश्यक सेवा में लापरवाही” मानते हुए Superintending Engineer (Technical), अमौसी जोन, MVVNL, लखनऊ ने अगले ही दिन निलंबन आदेश जारी कर दिया।

मगर कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में माना कि आरोप प्रथम दृष्टया इतने गंभीर नहीं दिखते कि उन्हें मेजर पनिशमेंट की श्रेणी में रखा जाए। इसी आधार पर निलंबन पर अंतरिम रोक दे दी गई।

कोर्ट के प्रमुख निर्देश:

  • विभाग 3 सप्ताह में काउंटर एफिडेविट दाखिल करे।
  • याचिकाकर्ता 1 सप्ताह में प्रत्युत्तर दे।
  • अगली सुनवाई तक निलंबन आदेश प्रभावी नहीं रहेगा
  • जांच अधिकारी 3 माह में जांच पूरी करें।
  • याचिकाकर्ता जांच में सहयोग करेगा; सहयोग न होने पर विभाग स्टे हटाने का आवेदन दे सकता है।

👉 यह आदेश कई असहज सवाल खड़े करता है—

  • क्या बिजली बाधित होने की हर घटना का पहला समाधान “निलंबन” बनता जा रहा है?
  • क्या तथ्यों की ठोस पड़ताल से पहले कठोर कार्रवाई विभागीय “रूटीन” बन गई है?
  • क्या “आवश्यक सेवा” का तर्क कर्मचारियों पर दबाव का औज़ार बन चुका है?

ऊर्जा विभाग के कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि अब पहले सस्पेंशन, बाद में जांच की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि न्यायालय ने संकेत दिया है कि कार्रवाई और आरोपों की गंभीरता में संतुलन जरूरी है।

हाईकोर्ट का यह स्टे आदेश पावर कॉरपोरेशन के लिए स्पष्ट संदेश है—जल्दबाज़ी में की गई कठोर कार्रवाई न्यायिक जांच में टिक नहीं पाएगी।

इंजीनियरों के लिए ‘कानूनी ढाल’ बने एडवोकेट निरंजन सिंह

इंजीनियरों पर जब भी विभागीय कार्रवाई की तलवार लटकती है, तब न्याय की राह दिखाने वाले कुछ नाम ही सामने आते हैं। ऐसे ही एक नाम हैं एडवोकेट निरंजन सिंह, जो लगातार पावर सेक्टर से जुड़े अभियंताओं के लिए वरदान साबित हो रहे हैं।

यह पहला मौका नहीं है जब एडवोकेट निरंजन सिंह ने न्यायालय के माध्यम से अभियंताओं को राहत दिलाई हो। इससे पहले जानकीपुरम जोन में कार्यरत अभियंता अरविंद कुमार भारती को केवल वकाया कनेक्शन काटने की आवाज उठाने के कारण निलंबित कर दिया गया था। मामला हाई कोर्ट पहुंचा और ठोस कानूनी पैरवी के बाद न सिर्फ निलंबन पर सवाल उठे, बल्कि अभियंता को बहाल भी कराया गया।

इसी कड़ी में अवर अभियंता अखिलेश सिंह, बरेली जनपद से मुरेंद्र पाल सिंह, तथा अवर अभियंता विश्वकर्मा शर्मा जैसे मामलों में भी एडवोकेट निरंजन सिंह ने हाई कोर्ट में प्रभावी तर्क रखे। परिणामस्वरूप, इन सभी अभियंताओं के निलंबन आदेश माननीय न्यायालय द्वारा खारिज किए गए।

सूत्रों की मानें तो इन मामलों में विभागीय कार्रवाई प्रक्रिया, तथ्यों की अनदेखी और नियमों की अवहेलना को अदालत के सामने मजबूती से रखा गया। यही कारण रहा कि न्यायालय ने एक के बाद एक मामलों में अभियंताओं को राहत दी।

👉 सवाल जो अब भी कायम हैं

  • क्या अभियंताओं पर कार्रवाई से पहले विभाग कानूनी प्रक्रिया का सही पालन करता है?
  • क्या निलंबन अब अनुशासन नहीं, बल्कि दबाव बनाने का हथियार बनता जा रहा है?
  • और जब अदालतें बार-बार निलंबन खारिज कर रही हैं, तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?

UPPCL MEDIA का मानना है कि जब विभागीय आदेश न्याय की कसौटी पर फेल होने लगें, तब एडवोकेट निरंजन सिंह जैसे अधिवक्ता अभियंताओं के लिए सिर्फ वकील नहीं, बल्कि न्याय की मजबूत दीवार बनकर सामने आते हैं।

  • UPPCL MEDIA

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