हाईकोर्ट का हथौड़ा: UPPCL की ‘पहले सस्पेंड, बाद में सोचेंगे’ नीति पर स्टे
UPPCL Media की विशेष रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) की कार्यशैली पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए बड़ा झटका दिया है। रिट ए नं. 359/2026 में न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने 19 सितम्बर 2025 के निलंबन आदेश के प्रभाव और संचालन पर अगली तारीख तक स्टे (रोक) लगा दी है।
मामला मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के एक अवर अभियंता से जुड़ा है, जिन्हें 19.09.2025 को निलंबित कर दिया गया, लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी चार्जशीट तक नहीं दी गई। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि 25 साल की बेदाग सेवा के बावजूद बिना किसी विभागीय जांच, बिना आरोपपत्र, केवल प्रशासनिक आधार पर निलंबन कर दिया गया।
कोर्ट ने माना कि:
- निलंबन तो कर दिया गया,
- विभागीय जांच की बात कही गई,
- जांच अधिकारी नियुक्त हुआ,
- लेकिन चार्जशीट अब तक कर्मचारी को नहीं मिली।
इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि मामला विचारणीय है और तब तक निलंबन आदेश पर रोक रहेगी।



साथ ही कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि:
- पावर कॉरपोरेशन 3 हफ्ते में जवाब दाखिल करे,
- याचिकाकर्ता 1 हफ्ते में प्रत्युत्तर दे,
- और 3 महीने के अंदर जांच पूरी करने की छूट भी दी गई है।
कोर्ट ने साफ कहा कि यदि कर्मचारी जांच में सहयोग नहीं करता है तो कॉरपोरेशन स्टे हटाने की अर्जी दे सकता है।
यह आदेश यूपीपीसीएल की उस कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है, जहां बिना आरोपपत्र दिए महीनों तक कर्मचारियों को निलंबित रखा जाता है। न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अब देखने वाली बात यह होगी कि पावर कॉरपोरेशन इस न्यायिक टिप्पणी के बाद अपनी विभागीय प्रक्रियाओं में सुधार करता है या नहीं।
इंजीनियरों के लिए ‘कानूनी ढाल’ बने एडवोकेट निरंजन सिंह
इंजीनियरों पर जब भी विभागीय कार्रवाई की तलवार लटकती है, तब न्याय की राह दिखाने वाले कुछ नाम ही सामने आते हैं। ऐसे ही एक नाम हैं एडवोकेट निरंजन सिंह, जो लगातार पावर सेक्टर से जुड़े अभियंताओं के लिए वरदान साबित हो रहे हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब एडवोकेट निरंजन सिंह ने न्यायालय के माध्यम से अभियंताओं को राहत दिलाई हो। इससे पहले जानकीपुरम जोन में कार्यरत अभियंता अरविंद कुमार भारती को केवल वकाया कनेक्शन काटने की आवाज उठाने के कारण निलंबित कर दिया गया था। मामला हाई कोर्ट पहुंचा और ठोस कानूनी पैरवी के बाद न सिर्फ निलंबन पर सवाल उठे, बल्कि अभियंता को बहाल भी कराया गया।
इसी कड़ी में अवर अभियंता अखिलेश सिंह, बरेली जनपद से मुरेंद्र पाल सिंह, तथा अवर अभियंता विश्वकर्मा शर्मा जैसे मामलों में भी एडवोकेट निरंजन सिंह ने हाई कोर्ट में प्रभावी तर्क रखे। परिणामस्वरूप, इन सभी अभियंताओं के निलंबन आदेश माननीय न्यायालय द्वारा खारिज किए गए।
सूत्रों की मानें तो इन मामलों में विभागीय कार्रवाई प्रक्रिया, तथ्यों की अनदेखी और नियमों की अवहेलना को अदालत के सामने मजबूती से रखा गया। यही कारण रहा कि न्यायालय ने एक के बाद एक मामलों में अभियंताओं को राहत दी।
👉 सवाल जो अब भी कायम हैं
- क्या अभियंताओं पर कार्रवाई से पहले विभाग कानूनी प्रक्रिया का सही पालन करता है?
- क्या निलंबन अब अनुशासन नहीं, बल्कि दबाव बनाने का हथियार बनता जा रहा है?
- और जब अदालतें बार-बार निलंबन खारिज कर रही हैं, तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?

UPPCL MEDIA का मानना है कि जब विभागीय आदेश न्याय की कसौटी पर फेल होने लगें, तब एडवोकेट निरंजन सिंह जैसे अधिवक्ता अभियंताओं के लिए सिर्फ वकील नहीं, बल्कि न्याय की मजबूत दीवार बनकर सामने आते हैं।








