14 लाशों पर लटक गई एक कलम! अलीगंज अग्निकांड में असली गुनहगार कौन? सिस्टम या सिर्फ एक अधिशासी अभियंता?

आग को छोड़िए, लोड पकड़िए! क्या यही है शासन की जांच?

🔥 14 छात्रों की मौत के बाद बिजली विभाग में बलि का बकरा कौन?

अलीगंज अग्निकांड में न्याय हुआ या सिस्टम ने अपना गुनाह छिपाने के लिए खोज लिया एक आसान शिकार?

लखनऊ के अलीगंज स्थित उपाध्याय परिसर में संचालित “Learning Space” लाइब्रेरी एवं कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड में 14 मासूम छात्रों की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। लेकिन इस दुखद घटना के बाद जिस तेजी से बिजली विभाग के एक अधिशासी अभियंता (कलेक्शन) गौरव कुमार को निलंबित किया गया, उससे कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह हादसा अत्यंत दर्दनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन हादसे के बाद शासन और विभागीय अधिकारियों द्वारा जिस तेजी से कार्रवाई की गई, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस दर्दनाक हादसे के बाद सबसे तेज अगर कुछ हुआ तो वह था—एक अधिशासी अभियंता का निलंबन।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस अग्निकांड का संबंध ऊर्जा विभाग के कलेक्शन अनुभाग के अधिशासी अभियंता से कैसे जोड़ दिया गया?

घटना के कुछ ही समय बाद जानकीपुरम जोन के अधिशासी अभियंता (कलेक्शन) गौरव कुमार को निलंबित कर दिया गया। क्या इतनी जल्दी कोई विस्तृत जांच पूरी हो गई थी? क्या किसी तकनीकी समिति ने यह निर्धारित कर दिया था कि हादसे का कारण केवल बिजली का लोड था? यदि नहीं, तो फिर यह कार्रवाई किस आधार पर की गई?

लखनऊ के अलीगंज स्थित उपाध्याय परिसर में संचालित Learning Space लाइब्रेरी एवं कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने 14 छात्रों की जिंदगी निगल ली, पूरे प्रदेश में शोक है, परिवार बिखर गए, सपने जलकर राख हो गए। लेकिन

  • न जांच पूरी हुई…
  • न तकनीकी रिपोर्ट आई…
  • न जिम्मेदारियां तय हुईं…

लेकिन जानकीपुरम जोन के अधिशासी अभियंता (कलेक्शन) गौरव कुमार को निलंबित कर दिया गया। ऐसा लगा मानो शासन को आग लगने का कारण नहीं, बल्कि जनता को दिखाने के लिए एक चेहरा चाहिए था।

क्या 14 मौतों का जवाब सिर्फ एक निलंबन है?

जिस भवन में आग लगी वहां लाइब्रेरी, कोचिंग सेंटर, स्टूडियो, पेट शॉप और क्लीनिक तक संचालित हो रहे थे।

सवाल यह है कि—

  • क्या भवन के पास वैध फायर एनओसी थी?
  • क्या पर्याप्त आपातकालीन निकास थे?
  • क्या अग्निशमन यंत्र कार्यशील थे?
  • क्या क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाया जा रहा था?
  • क्या स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों ने कभी सुरक्षा मानकों की जांच की?

इन सवालों के जवाब अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए। लेकिन बिजली विभाग के एक अधिकारी पर कार्रवाई जरूर हो गई।

लोड बढ़ा होता तो क्या आग नहीं लगती?

उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार परिसर का विद्युत कनेक्शन वर्ष 2012 में जारी हुआ था और वर्ष 2016 में लोड वृद्धि भी की गई थी। विभाग हर महीने उपभोक्ता को बिजली बिल के साथ “Bill-cum-Notice” जारी करता है, जिसमें स्वीकृत भार तथा उपयोग किए जा रहे भार की जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज होती है।

यदि उपभोक्ता निर्धारित सीमा से अधिक लोड प्रयोग करता है तो विभाग अतिरिक्त डिमांड पेनाल्टी वसूलता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिस अतिरिक्त लोड पर विभाग वर्षों से पेनाल्टी लेकर राजस्व कमा रहा है, वही अचानक किसी अधिकारी के निलंबन का आधार कैसे बन गया?

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—

यदि विभाग के सॉफ्टवेयर या रजिस्टर में लोड पहले से बढ़ा हुआ दर्ज होता, तो क्या यह भीषण अग्निकांड रुक जाता?  यदि उत्तर “नहीं” है, तो फिर लोड और अग्निकांड के बीच संबंध क्या है?

  • उपलब्ध तथ्यों के अनुसार कनेक्शन वर्षों पहले जारी हुआ।
  • लोड वृद्धि भी वर्षों पहले हो चुकी थी।
  • हर महीने बिल बन रहा था।
  • हर महीने विभाग राजस्व वसूल रहा था।
  • हर महीने Bill-cum-Notice उपभोक्ता को भेजा जा रहा था।

यदि उपभोक्ता अतिरिक्त भार प्रयोग कर रहा था तो विभाग अतिरिक्त डिमांड पेनाल्टी भी वसूल रहा था। तो फिर हादसे के बाद अचानक वही लोड सबसे बड़ा अपराध कैसे बन गया?

सबसे बड़ा सवाल—

यदि विभाग के सॉफ्टवेयर में उस दिन लोड बढ़ा हुआ दर्ज होता, तो क्या आग नहीं लगती?

  • क्या 14 छात्रों की जान बच जाती?

यदि जवाब “नहीं” है, तो फिर यह कार्रवाई किस तर्क पर आधारित है?

मध्यांचल डिस्कॉम प्रबन्ध निदेशिका श्रीमति रिया केजरीवाल महोदया, जनता जवाब चाहती है

  • क्या अधिशासी अभियंता (कलेक्शन) का काम फायर एनओसी चेक करना है?
  • क्या उसका काम बिल्डिंग की सुरक्षा व्यवस्था देखना है?
  • क्या उसका काम लाइब्रेरी में बैठने वाले छात्रों की संख्या गिनना है?
  • क्या उसका काम यह देखना है कि किसी भवन में कितने एसी चल रहे हैं?

यदि नहीं… तो फिर यह निलंबन क्यों?

3.20 लाख उपभोक्ता, एक अफसर और उम्मीद सर्वशक्तिमान जैसी?

वर्टिकल व्यवस्था लागू होने के बाद जानकीपुरम जोन में लगभग 3.20 लाख उपभोक्ता हैं। हर महीने लगभग 500 नए कनेक्शन जुड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक अधिशासी अभियंता (कलेक्शन) की प्राथमिक जिम्मेदारी राजस्व वसूली, वाणिज्यिक मामलों और उपभोक्ता शिकायतों का निस्तारण है। क्या कोई यह बताने को तैयार है कि 3.20 लाख उपभोक्ताओं के बीच बैठा एक कलेक्शन अधिकारी रोजाना किस भवन में कितना लोड चल रहा है, यह भी देखे?

हाल ही में एक अवर अभियंता से मारपीट के मामले में स्वयं मुख्य अभियंता वी.पी. सिंह ने कहा था कि “तीन लाख उपभोक्ताओं पर कहां-कहां नजर रखी जा सकती है?”

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब एक मुख्य अभियंता भी लाखों उपभोक्ताओं की हर गतिविधि पर लगातार निगरानी नहीं रख सकता, तो फिर एक कलेक्शन एक्सईएन से ऐसी अपेक्षा क्यों की जा रही है?

  • राजस्व वसूली की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर…
  • वाणिज्यिक विवादों का निस्तारण भी उन्हीं पर…
  • बकाया वसूली और रिकवरी भी उन्हीं पर…
  • उपभोक्ता शिकायतों की समीक्षा भी उन्हीं पर…

और यदि कहीं किसी इमारत में आग लग जाए या कोई अन्य हादसा हो जाए, तो उसकी जवाबदेही भी उन्हीं पर?

यदि वास्तव में तीन लाख से अधिक उपभोक्ताओं वाले क्षेत्र में बैठा एक अधिकारी हर भवन, हर परिसर और हर गतिविधि पर नजर रख सकता है, तो फिर नगर निगम, विकास प्राधिकरण, अग्निशमन विभाग, विद्युत सुरक्षा निदेशालय और अन्य निरीक्षण एजेंसियों की आवश्यकता ही क्या रह जाती है?

प्रशासनिक जवाबदेही तय होना आवश्यक है, लेकिन जवाबदेही और बलि का बकरा बनाने में अंतर होता है। किसी भी घटना की निष्पक्ष जांच के बजाय केवल एक अधिकारी पर पूरा दोष मढ़ देना न तो व्यवस्था की कमियों को दूर करेगा और न ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक पाएगा।

सवाल यह नहीं है कि जिम्मेदारी किसकी है, सवाल यह है कि क्या 3.20 लाख उपभोक्ताओं वाले जोन में एक अधिकारी से सर्वज्ञ और सर्वव्यापी होने की उम्मीद करना व्यावहारिक है? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर व्यवस्था को देना होगा।

कार्रवाई या संदेश देने की कोशिश? या फिर सिस्टम की नाकामी पर पर्दा डालने की कोशिश?

UPPCL MEDIA का मानना है कि दोषियों की पहचान निष्पक्ष जांच के बाद होनी चाहिए। लेकिन बिना व्यापक तकनीकी जांच के किसी अधिकारी को निलंबित करना न्यायिक प्रक्रिया से अधिक “संदेश देने की राजनीति” प्रतीत होता है। 14 छात्रों की मौत का दर्द पूरे प्रदेश का दर्द है। लेकिन इस दर्द की आड़ में किसी अधिकारी को बलि का बकरा बनाना न तो मृतकों के प्रति न्याय है और न ही प्रशासनिक ईमानदारी। यदि वास्तविक कारण भवन सुरक्षा, फायर एनओसी, निकास व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण, अवैध निर्माण या अन्य प्रशासनिक लापरवाही है, तो जांच का फोकस वहां होना चाहिए।

  • जनता 14 मौतों का जवाब मांग रही थी।
  • मीडिया सवाल पूछ रही थी।
  • शासन पर दबाव था।

ऐसे में सबसे आसान रास्ता क्या था?

  • एक अधिकारी को निलंबित करो…

हेडलाइन बनाओ…

और यह संदेश दो कि सरकार ने कार्रवाई कर दी।

लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है— क्या असली दोषियों तक जांच पहुंचेगी? या फिर एक निलंबन आदेश ही पूरी जांच का निष्कर्ष मान लिया जाएगा?

पहले अपने दफ्तर देखिए… फायर ऑडिट कराइए

ऊर्जा विभाग यदि वास्तव में सुरक्षा को लेकर गंभीर है, तो पहले अपने कार्यालयों की स्थिति सार्वजनिक करे। लखनऊ के अनेक विद्युत कार्यालयों में फायर एनओसी नहीं है। कई कार्यालयों में अग्निशमन उपकरण या तो निष्क्रिय हैं या निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं। रोजाना सैकड़ों उपभोक्ताओं की भीड़ इन कार्यालयों में आती है। यदि दुर्भाग्यवश किसी विद्युत कार्यालय में ऐसी ही घटना हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? क्या तब भी किसी कलेक्शन अधिकारी को दोषी ठहरा दिया जाएगा?

  • लखनऊ के कितने बिजली विभागीय कार्यालयों के पास वैध फायर एनओसी है?
  • कितने कार्यालयों में अग्निशमन उपकरण पूरी तरह कार्यशील हैं?
  • कितने कार्यालयों का हालिया फायर ऑडिट हुआ है?
  • रोज सैकड़ों उपभोक्ताओं से भरे रहने वाले विभागीय भवन कितने सुरक्षित हैं?

यदि कल किसी मुख्य अभियंता कार्यालय में आग लग जाए तो क्या वहां भी किसी कलेक्शन अधिकारी को दोषी ठहरा दिया जाएगा?

UPPCL MEDIA का मानना है कि

  • 14 छात्रों की मौत बेहद दुखद है।
  • दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
  • लेकिन बिना विस्तृत तकनीकी जांच के किसी अधिकारी को दोषी मान लेना न्याय नहीं कहलाता।
  • यह जांच से पहले फैसला सुनाने जैसा है।

यह जवाबदेही कम और दिखावटी सख्ती ज्यादा दिखाई देती है। लेकिन एक सवाल आज ही पूछा जा सकता है—

“14 छात्रों की मौत का सच अभी तक नहीं मिला… फिर बलि का बकरा इतनी जल्दी कैसे मिल गया?”

UPPCL MEDIA का सीधा सवाल

  • आग किस वजह से लगी—जांच बताएगी।
  • सुरक्षा में चूक किसकी थी—जांच बताएगी।
  • मौतों का असली जिम्मेदार कौन है—जांच बताएगी।

क्या यह कार्रवाई न्याय है? या फिर…

“नाच न जाने आंगन टेढ़ा” वाली कहावत को सच साबित करने की एक और कोशिश?

14 छात्रों की मौत का सच सामने आना चाहिए, लेकिन सच की जगह यदि किसी को बलि का बकरा बनाया जाएगा, तो यह न केवल विभागीय कर्मचारियों का मनोबल तोड़ेगा बल्कि वास्तविक जिम्मेदारों को भी बचा लेगा।

“जब सिस्टम कटघरे में हो, तब सवाल पूछना ही पत्रकारिता है।”

  • UPPCL MEDIA

    "यूपीपीसीएल मीडिया" ऊर्जा से संबंधित एक समाचार मंच है, जो विद्युत तंत्र और बिजली आपूर्ति से जुड़ी खबरों, शिकायतों और मुद्दों को खबरों का रूप देकर बिजली अधिकारीयों तक तक पहुंचाने का काम करता है। यह मंच मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में बिजली निगमों की गतिविधियों, नीतियों, और उपभोक्ताओं की समस्याओं पर केंद्रित है।यह आवाज प्लस द्वारा संचालित एक स्वतंत्र मंच है और यूपीपीसीएल का आधिकारिक हिस्सा नहीं है।

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