मिर्जापुर में ‘वसूली साम्राज्य’ का भंडाफोड़ या लीपापोती का खेल?

विजिलेंस पहुंची शिकायत, पुलिस जांच, विभागीय जांच, उपभोक्ताओं के बयान… फिर भी बड़ा सवाल – आखिर किसे बचाया जा रहा है?

UPPCL MEDIA | विशेष पड़ताल

मिर्जापुर। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के मिर्जापुर क्षेत्र में सामने आया कथित अवैध वसूली प्रकरण अब केवल एक संविदाकर्मी या एक अवर अभियंता तक सीमित मामला नहीं रह गया है। उपलब्ध दस्तावेजों को देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि मामला जितना सतह पर दिख रहा है, उससे कहीं अधिक गहरा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिकायत झूठी थी तो विजिलेंस तक क्यों पहुंची? यदि शिकायत सही थी तो अब तक किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

शुरुआत एक शिकायत से हुई, लेकिन शिकायत ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी

मंगला प्रसाद निवासी पीली कोठी, मिर्जापुर द्वारा उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) को शिकायत भेजी गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि विद्युत वितरण खंड-द्वितीय फतहां, मिर्जापुर में तैनात अवर अभियंता विनय कुमार गुप्ता के नाम पर संविदाकर्मी लाइनमैन अभिषेक सिंह उपभोक्ताओं से धन उगाही कर रहा है। आरोप कोई मामूली नहीं था।

आरोप था कि बिजली कनेक्शन, मीटर, बकाया निस्तारण और अन्य विभागीय कार्यों के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं।

विजिलेंस ने मामला गंभीर माना, तभी तो विभाग को भेजा

  • 11 अगस्त 2025 को पुलिस अधीक्षक, उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) लखनऊ ने मामले को संज्ञान में लिया।
  • इसके बाद मामला पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड वाराणसी को भेजा गया।
  • फिर 02 सितम्बर 2025 को अधीक्षण अभियंता (प्रशासन) वाराणसी ने मुख्य अभियंता (वितरण) मिर्जापुर को पत्र लिखकर जांच कराने के निर्देश दिए।

यहां पहला सवाल खड़ा होता है—

यदि मामला महत्वहीन था तो विजिलेंस ने कार्रवाई क्यों की?

मुख्य अभियंता ने तत्काल जांच समिति बनाई

  • मुख्य अभियंता (वितरण) मिर्जापुर ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की।
  • समिति में तकनीकी, प्रशासनिक और लेखा पक्ष के अधिकारियों को शामिल किया गया।
  • समिति को केवल तीन कार्यदिवस के भीतर रिपोर्ट देने का आदेश दिया गया।

यानी मामला इतना गंभीर माना गया कि तत्काल जांच आवश्यक समझी गई।

जांच में जो सामने आया, वह चौंकाने वाला है

  • जांच समिति ने दर्जनों उपभोक्ताओं से संपर्क किया।
  • जिन उपभोक्ताओं के नाम रिपोर्ट में दर्ज हैं, उनमें कई ने स्वीकार किया कि उन्होंने अभिषेक सिंह को धनराशि दी।
  • जांच रिपोर्ट में विभिन्न उपभोक्ताओं के नाम, पते, मोबाइल नंबर और भुगतान की धनराशि तक दर्ज की गई।

रिपोर्ट के अनुसार:

  • किसी ने मीटर लगाने के नाम पर पैसा दिया।
  • किसी ने कनेक्शन जारी कराने के लिए पैसा दिया।
  • किसी ने बकाया प्रकरण निस्तारित कराने के लिए पैसा दिया।
  • किसी ने विभागीय कार्रवाई से बचने के लिए पैसा दिया।

यानी उपभोक्ताओं के बयान खुद बता रहे हैं कि पैसा लिया गया।

अब आता है सबसे विस्फोटक हिस्सा

  • जांच रिपोर्ट में उल्लेख मिलता है कि उपभोक्ताओं ने पैसा संविदाकर्मी अभिषेक सिंह को दिया।
  • लेकिन उपभोक्ताओं का आरोप था कि यह पैसा अवर अभियंता विनय कुमार गुप्ता के नाम पर लिया जा रहा था।

यहीं पूरा मामला साधारण वसूली से निकलकर विभागीय जवाबदेही के दायरे में पहुंच जाता है।

क्योंकि सवाल उठता है—

  • क्या कोई संविदाकर्मी अकेले पूरे क्षेत्र में अधिकारियों का नाम लेकर वसूली कर सकता है?
  • क्या किसी अधिकारी को इसकी भनक नहीं लगी?
  • क्या उपभोक्ता बिना भरोसे के किसी संविदाकर्मी को हजारों रुपये दे देंगे?

जांच रिपोर्ट में एक और दिलचस्प मोड़

  • रिपोर्ट में कई उपभोक्ताओं ने धन देने की पुष्टि की।
  • लेकिन साथ ही यह भी दर्शाया गया कि प्रत्यक्ष रूप से अवर अभियंता को पैसा देने का प्रमाण नहीं मिला।

यहीं से पूरा मामला संदेहास्पद हो जाता है।

क्योंकि—

यदि पैसा लिया गया था, यदि उपभोक्ता बयान दे रहे हैं, यदि शिकायत विजिलेंस तक पहुंची, यदि जांच समिति बनी, तो फिर जिम्मेदार कौन है?

क्या संविदाकर्मी को ‘ढाल’ बनाया गया?

बिजली विभाग के जानकारों का कहना है कि किसी भी क्षेत्र में संविदाकर्मी अकेले विभागीय निर्णय नहीं ले सकता।

  • न वह मीटर स्वीकृत करता है।
  • न कनेक्शन जारी करता है।
  • न बकाया समाप्त करता है।
  • न राजस्व रिकॉर्ड बदलता है।

फिर उपभोक्ता आखिर किस भरोसे पर पैसा दे रहे थे? यही वह सवाल है जिसका जवाब जांच रिपोर्ट भी पूरी तरह नहीं दे पाई।

दस्तावेज बताते हैं कि मामला वर्षों तक चलता रहा

  • जांच में जिन उपभोक्ताओं के बयान लिए गए, वे अलग-अलग स्थानों और अलग-अलग प्रकरणों से जुड़े हुए हैं।
  • इससे यह संकेत मिलता है कि मामला कोई एक दिन की घटना नहीं बल्कि लंबे समय से चल रही व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है।

यदि ऐसा है तो फिर पर्यवेक्षण अधिकारियों की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

UPPCL MEDIA के अहम सवाल

🔥 क्या विभाग ने केवल जांच रिपोर्ट बनाकर फाइल बंद करने की तैयारी कर ली?

🔥 जिन उपभोक्ताओं ने पैसे देने की बात स्वीकार की, उनका पैसा वापस कराया गया या नहीं?

🔥 क्या केवल संविदाकर्मी पर कार्रवाई कर बड़े अधिकारियों को बचाया जा रहा है?

🔥 यदि अवर अभियंता निर्दोष हैं तो उनके नाम पर वसूली करने वाले व्यक्ति पर तत्काल एफआईआर क्यों नहीं हुई?

🔥 यदि वसूली हुई ही नहीं तो फिर विजिलेंस तक शिकायत क्यों पहुंची?

🔥 यदि वसूली हुई थी तो धन किसके पास गया?

🔥 क्या विभाग इस मामले को दबाने में लगा है?

यूपीपीसीएल मीडिया का मानना है कि मिर्जापुर का यह प्रकरण अब सिर्फ अवैध वसूली का मामला नहीं रह गया है।

  • यह विभागीय नियंत्रण, निगरानी, जवाबदेही और भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र की वास्तविक स्थिति का आईना बन चुका है।
  • विजिलेंस की दस्तक, पुलिस शिकायत, विभागीय पत्राचार, जांच समिति, उपभोक्ताओं के बयान और धनराशि के आरोप—ये सभी संकेत देते हैं कि धुआं कहीं न कहीं से जरूर उठ रहा है।
  • अब देखना यह है कि विभाग असली जिम्मेदारों तक पहुंचता है या फिर पूरी कहानी एक संविदाकर्मी के सिर पर डालकर फाइलों में दफन कर दी जाती है।
  • “मिर्जापुर में सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पैसा किसने लिया… सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में लिया गया?”

UPPCL MEDIA इस पूरे प्रकरण की अगली परत भी जल्द उजागर करेगा।

  • UPPCL MEDIA

    "यूपीपीसीएल मीडिया" ऊर्जा से संबंधित एक समाचार मंच है, जो विद्युत तंत्र और बिजली आपूर्ति से जुड़ी खबरों, शिकायतों और मुद्दों को खबरों का रूप देकर बिजली अधिकारीयों तक तक पहुंचाने का काम करता है। यह मंच मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में बिजली निगमों की गतिविधियों, नीतियों, और उपभोक्ताओं की समस्याओं पर केंद्रित है।यह आवाज प्लस द्वारा संचालित एक स्वतंत्र मंच है और यूपीपीसीएल का आधिकारिक हिस्सा नहीं है।

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