⚡ हाईकोर्ट की चोट, UPPCL में हड़कंप! “अधिकार नहीं फिर भी सस्पेंड?” — अधीक्षण अभियंताओं पर कोर्ट की सख्त नजर

हाईकोर्ट की मुहर: ‘यूपीपीसीएल मीडिया’ की खबर सही साबित, S.E. को नहीं है निलंबन का अधिकार

लखनऊ। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (MVVNL) लखनऊ ग्रामीण में अधीक्षण अभियंता द्वारा तीन अवर अभियंताओं के निलंबन का मामला अब पूरी तरह साफ हो गया है। “यूपीपीसीएल मीडिया” द्वारा 26 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित खबर में उठाए गए सवालों पर माननीय हाईकोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है।

🔗 पूरी खबर पढ़ें:
https://uppclmedia.in/breaking/33669

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer) को अवर अभियंताओं को निलंबित करने का कोई अधिकार नहीं है। यह अधिकार केवल मुख्य अभियंता (Chief Engineer) स्तर तक सीमित है। गौरतलब है कि मुख्यालय द्वारा 02 जनवरी 2019 को जारी आदेश में साफ तौर पर उल्लेख किया गया था कि निलंबन और ट्रांसफर का अधिकार मुख्य अभियंता स्तर तक ही सीमित रहेगा। इसके बावजूद अधीक्षण अभियंता द्वारा एक साथ तीन अवर अभियंताओं को निलंबित कर दिया गया था, जिससे विभाग में हड़कंप मच गया था।

“यूपीपीसीएल मीडिया” ने अपनी खबर में इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए मुख्यालय के आदेश की अनदेखी और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई कार्रवाई को उजागर किया था। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि वह रिपोर्ट तथ्यात्मक रूप से सही थी।

इस निर्णय के बाद न केवल संबंधित निलंबन आदेश की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं, बल्कि विभागीय स्तर पर अधिकारों के दुरुपयोग और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

अधीक्षण अभियंता के निलंबन अधिकार पर हाईकोर्ट की रोक, UPPCL में मचा हलचल

उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) में लंबे समय से चल रही “मनमानी सस्पेंशन पॉलिसी” पर आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ब्रेक लगा दिया है। नोएडा में तैनात अवर अभियंता सचिन वर्मा के निलंबन पर कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाते हुए साफ संकेत दे दिया है कि अधिकार से बाहर जाकर की गई कार्रवाई अब नहीं चलेगी।

न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि 2020 की नियमावली के तहत अधीक्षण अभियंता (S.E.) को निलंबन का अधिकार है ही नहीं, क्योंकि यह शक्ति केवल नियुक्ति प्राधिकारी यानी मुख्य अभियंता के पास सुरक्षित है।

🔥 “पुराने आदेश बनाम नई नियमावली” — कोर्ट ने उठाए सीधे सवाल

विभाग की ओर से दलील दी गई कि पुराने कार्यकारी आदेशों में S.E. को यह शक्ति दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने साफ पूछा 👉 “जब नई नियमावली लागू हो चुकी है, तो क्या पुराने आदेश अभी भी जिंदा हैं?”  यहीं पर विभाग की दलील कमजोर पड़ती नजर आई।

साथ ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि निलंबन आदेश में न तो स्पष्ट चार्जशीट थी,  न ही विधिवत अनुशासनात्मक प्रक्रिया का पालन दिखा।

⚡ UPPCL मीडिया की खबर पर लगी “मुहर”!

UPPCL मीडिया ने पहले ही 26/10/2025 को अपने खुलासे में बताया था कि 👉 “अधीक्षण अभियंता अधिकार के बिना J.E. को सस्पेंड कर रहे हैं” अब हाईकोर्ट के इस आदेश ने उसी मुद्दे पर कानूनी मोहर लगा दी है।

🚨 लखनऊ ग्रामीण का मामला फिर चर्चा में

मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (MVVNL), लखनऊ ग्रामीण में अधीक्षण अभियंता द्वारा 👉 एक नहीं, तीन-तीन अवर अभियंताओं को निलंबित करने का मामला पहले से ही विवादों में था। जबकि मुख्यालय के 02.01.2019 के आदेश में स्पष्ट है कि —
📜 निलंबन/ट्रांसफर का अधिकार मुख्य अभियंता स्तर तक सीमित है
👉 S.E. के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं।

फिर भी बार-बार आदेश जारी होना अब सीधे-सीधे “ultra vires” यानी अधिकार-विहीन कार्रवाई की श्रेणी में आता दिख रहा है।

हाईकोर्ट ने JE के निलंबन पर लगाई रोक, अधीक्षण अभियंताओं के अधिकारों पर उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) में अवर अभियंता (JE) के निलंबन मामले में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश नोएडा में तैनात अवर अभियंता सचिन वर्मा की याचिका पर न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की एकल पीठ ने सुनवाई के बाद पारित किया।

न्यायालय ने प्रथमदृष्टया पाया कि UPPCL कर्मचारी (अनुशासनात्मक एवं अपील) नियमावली 2020 के तहत निलंबन की शक्ति केवल नियुक्ति प्राधिकारी, यानी मुख्य अभियंता के पास निहित है। ऐसे में अधीक्षण अभियंता द्वारा जारी निलंबन आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर प्रतीत होता है। कोर्ट ने इस आधार पर फिलहाल निलंबन पर रोक लगाते हुए विभाग से विस्तृत जवाब तलब किया है।

याची की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि वर्ष 2020 में लागू नई नियमावली के बाद किसी भी पुराने कार्यकारी आदेश के आधार पर निलंबन की कार्रवाई वैध नहीं मानी जा सकती। वहीं, विभाग की ओर से पुराने आदेशों का हवाला देते हुए अधीक्षण अभियंता के अधिकार का बचाव किया गया। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए पूछा कि नई नियमावली लागू होने के बाद पुराने आदेशों की वैधता कैसे बनी रह सकती है।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि निलंबन आदेश के साथ न तो विधिवत अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रारंभ किए जाने का स्पष्ट उल्लेख है और न ही कोई आरोप पत्र संलग्न किया गया है। न्यायालय ने इसे गंभीर प्रक्रिया संबंधी कमी मानते हुए अगली सुनवाई तक निलंबन आदेश के प्रभाव पर रोक लगा दी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सक्षम प्राधिकारी, यानी मुख्य अभियंता, नियमों के अनुरूप उचित समझें तो वे निलंबन की पुष्टि कर सकते हैं। साथ ही विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह यह स्पष्ट करे कि अधीक्षण अभियंता को निलंबन का अधिकार किस वैधानिक प्रावधान के तहत प्राप्त है।

इस फैसले के बाद UPPCL में अधीक्षण अभियंताओं द्वारा किए गए अन्य निलंबनों पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। विशेष रूप से मध्यांचल विद्युत वितरण निगम, लखनऊ ग्रामीण क्षेत्र में अधीक्षण अभियंता द्वारा एक से अधिक अवर अभियंताओं को निलंबित किए जाने के मामले पहले से ही चर्चा में रहे हैं। अब इस न्यायिक आदेश के बाद ऐसे सभी मामलों की वैधता पर पुनर्विचार की संभावना बढ़ गई है।

गौरतलब है कि UPPCL मुख्यालय द्वारा पूर्व में जारी आदेशों में भी निलंबन एवं स्थानांतरण के अधिकार उच्च स्तर के अधिकारियों तक सीमित बताए गए हैं। ऐसे में अधीक्षण अभियंताओं द्वारा लगातार की जा रही इस प्रकार की कार्रवाई विभागीय नियमों और अनुशासनात्मक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश न केवल एक कर्मचारी को राहत देने वाला है, बल्कि पूरे विभाग के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि प्रशासनिक निर्णय निर्धारित नियमावली के अनुरूप ही लिए जाने चाहिए। मनमाने ढंग से अधिकारों का प्रयोग न केवल अवैध है, बल्कि इससे संस्थागत अनुशासन भी प्रभावित होता है।

मामले की अगली सुनवाई में यह तय होना अहम होगा कि संबंधित निलंबन आदेश विधिसम्मत था या नहीं। फिलहाल, हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद UPPCL में प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है।

🔍 अब मुख्यालय की अग्निपरीक्षा

हाईकोर्ट ने विभाग से जवाब तलब कर लिया है। अब देखना यह है कि —

👉 क्या मुख्य अभियंता इन अवैध निलंबनों को निरस्त करेंगे?
👉 क्या संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
👉 या फिर “फाइलों में सन्नाटा” जारी रहेगा?

⚡ “करंट” अब कोर्ट से दौड़ा है

यह आदेश सिर्फ एक कर्मचारी की राहत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए संदेश है —
📢 “नियमों से ऊपर कोई नहीं!”

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला UPPCL में अनुशासन के ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकता है।

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ऊर्जा विभाग की हर हलचल पर पैनी नजर —
क्योंकि यहां करंट सिर्फ तारों में नहीं, अब फैसलों में भी दौड़ रहा है!स हस्तक्षेप के बाद UPPCL में प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है।

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