लखनऊ की बिजली व्यवस्था को सुधारने के नाम पर 261 करोड़ रुपये के कार्यों को मंजूरी दिए जाने की खबर सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि इससे राजधानी के सभी जोनों में बिजली व्यवस्था मजबूत होगी, लाइन लॉस कम होगा, ट्रांसफार्मर क्षमता बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को बेहतर सप्लाई मिलेगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में “बिजली सुधार योजना” है या फिर एक और “ठेका उत्सव”? यदि पिछले वर्षों के अनुभवों को देखा जाए तो हर गर्मी से पहले करोड़ों रुपये के कार्य स्वीकृत होते हैं, सैकड़ों ट्रांसफार्मर बदले जाते हैं, हजारों मीटर केबल डाली जाती है, पोल बदले जाते हैं, लेकिन जैसे ही तापमान 40 डिग्री पार करता है, बिजली व्यवस्था की पोल खुल जाती है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) ने राजधानी लखनऊ की बिजली व्यवस्था सुधारने के नाम पर 261 करोड़ रुपये की कार्ययोजना को मंजूरी दे दी है। अधिकारियों का दावा है कि इससे राजधानी की बिजली व्यवस्था प्रदेश के 75 जिलों के लिए मॉडल बनेगी। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) ने राजधानी लखनऊ की बिजली व्यवस्था सुधारने के नाम पर 261 करोड़ रुपये की विशाल कार्ययोजना को मंजूरी दे दी है। दावा किया जा रहा है कि नए ट्रांसफार्मर लगेंगे, उपकेंद्रों की क्षमता बढ़ेगी, नई लाइनें बिछेंगी और बिजली आपूर्ति बेहतर होगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे वास्तव में उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी या फिर हर साल की तरह करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हालात जस के तस रहेंगे?
लखनऊ में यह पहला मौका नहीं है जब बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए करोड़ों रुपये स्वीकृत हुए हों। पिछले वर्षों में भी आरडीएसएस, आईपीडीएस, सिस्टम स्ट्रेंथनिंग और विभिन्न योजनाओं के तहत अरबों रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद गर्मी आते ही ट्रांसफार्मर फुंकते हैं, फीडर ओवरलोड हो जाते हैं, लो-वोल्टेज की समस्या बढ़ जाती है और उपभोक्ता घंटों बिजली संकट झेलने को मजबूर होते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन क्षेत्रों में आज नए ट्रांसफार्मर लगाने और क्षमता वृद्धि की बात हो रही है, उनमें से कई क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में भी करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। यदि तब सही योजना बनी होती तो आज फिर उन्हीं क्षेत्रों को “संवेदनशील” घोषित करने की नौबत क्यों आती?
जनता पूछ रही है—261 करोड़ आखिर जाएंगे कहाँ?
261 करोड़ रुपये खर्च होंगे, लेकिन यदि अगले वर्ष भी वही ट्रांसफार्मर ओवरलोड मिले, वही फीडर ट्रिप करें और वही बिजली कटौती जारी रहे तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या किसी मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता या अधिशासी अभियंता की जवाबदेही तय की जाएगी? या फिर अगले वर्ष एक नई योजना बनाकर फिर करोड़ों रुपये स्वीकृत करा लिए जाएंगे?
लखनऊ के उपभोक्ता जानना चाहते हैं कि—
- कौन-कौन से कार्य होंगे?
- किस एजेंसी को ठेका मिलेगा?
- टेंडर प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी?
- कार्य की गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा?
- कार्य पूरा होने की समयसीमा क्या होगी?
- यदि कार्य अधूरा या घटिया हुआ तो जिम्मेदार कौन होगा?
बिजली विभाग के इतिहास में करोड़ों के कई ऐसे कार्य हुए हैं जिनका असर जमीन पर दिखाई नहीं दिया। उपभोक्ताओं को न तो निर्बाध बिजली मिली और न ही शिकायतों में कमी आई।
उपभोक्ताओं को चाहिए परिणाम, घोषणाएं नहीं
लखनऊ के उपभोक्ता अब प्रेस विज्ञप्तियों और योजनाओं से अधिक जमीनी परिणाम देखना चाहते हैं। उपभोक्ताओं के लिए असली राहत तब मानी जाएगी जब—
- ट्रांसफार्मर फुंकने की घटनाएं कम हों।
- लो-वोल्टेज की समस्या समाप्त हो।
- अघोषित कटौती बंद हो।
- शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण हो।
- फाल्ट की संख्या में वास्तविक कमी आए।
ठेकेदार मालामाल, उपभोक्ता बेहाल?
बिजली विभाग में अक्सर यह चर्चा रहती है कि नए निर्माण कार्यों, केबल बदलने, ट्रांसफार्मर लगाने और पोल शिफ्टिंग के नाम पर भारी भरकम बजट खर्च होता है। लेकिन कई स्थानों पर कुछ महीनों बाद वही केबल दोबारा खराब मिलती है, ट्रांसफार्मर ओवरलोड हो जाते हैं और उपभोक्ता फिर अंधेरे में बैठा रहता है।
यदि 261 करोड़ रुपये वास्तव में जनता के हित में खर्च होने हैं तो विभाग को प्रत्येक कार्य का पूरा विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर डालना चाहिए।
क्या 261 करोड़ का कोई सामाजिक ऑडिट होगा?
- उपभोक्ताओं के बीच चर्चा का विषय यह भी है कि आखिर 261 करोड़ रुपये की लागत कैसे निर्धारित की गई?
- क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी ने तकनीकी मूल्यांकन किया?
- क्या परियोजनाओं का लागत-लाभ विश्लेषण सार्वजनिक किया जाएगा?
- क्या जनता को बताया जाएगा कि किस मोहल्ले में कितना खर्च होगा और उससे कितने उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगा?
- या फिर पूरा मामला केवल फाइलों और टेंडरों तक सीमित रहेगा?
सबसे ज्यादा 96 करोड़ गोमती नगर जोन पर क्यों?
- गोमती नगर जोन में अकेले 96 करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं।
- विभागीय सूत्रों की मानें तो गोमती नगर और इंदिरा नगर क्षेत्रों में बड़ी संख्या में वीआईपी और प्रभावशाली लोग रहते हैं। इसलिए यहां बिजली व्यवस्था को लेकर विशेष फोकस रखा गया है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या बिजली विभाग का प्राथमिक उद्देश्य सभी उपभोक्ताओं को समान सुविधा देना है या फिर वीआईपी इलाकों को प्राथमिकता देना? यदि राजधानी के ग्रामीण क्षेत्रों में भी उपभोक्ता उतना ही बिल जमा करते हैं तो फिर सुविधाओं का वितरण समान क्यों नहीं दिखाई देता?
क्या बढ़ेगा बिजली बिल?
विशेषज्ञों का मानना है कि वितरण कंपनियों द्वारा किए गए पूंजीगत खर्च का भार अंततः किसी न किसी रूप में उपभोक्ताओं पर पड़ता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में इस निवेश का असर बिजली दरों पर भी दिखाई देगा?
उपभोक्ता यह भी पूछ रहे हैं कि जब पहले से ही बिजली दरें बढ़ रही हैं, फ्यूल सरचार्ज अलग से लगाया जा रहा है, तो क्या नए प्रोजेक्टों का बोझ भी अंततः आम जनता को उठाना पड़ेगा?
जवाबदेही तय होगी या नहीं?
यदि 261 करोड़ की योजना से—
- ट्रिपिंग बंद होती है,
- ओवरलोडिंग कम होती है,
- ट्रांसफार्मर फुंकना रुकता है,
- लो-वोल्टेज की समस्या खत्म होती है,
- शिकायतों का निस्तारण तेज होता है,
तो निश्चित रूप से यह स्वागत योग्य कदम होगा। लेकिन यदि यह योजना भी फाइलों, टेंडरों और कमीशनखोरी के गलियारों में सिमट गई तो जनता इसे “बिजली सुधार योजना” नहीं बल्कि “ठेका उत्सव 2026” के नाम से याद रखेगी।
उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) ने राजधानी लखनऊ की बिजली व्यवस्था सुधारने के नाम पर 261 करोड़ रुपये की कार्ययोजना को मंजूरी दे दी है। चारों जोनों में नए ट्रांसफार्मर, नई लाइनें, क्षमता वृद्धि और नए उपकेंद्र बनाने की घोषणा की गई है। अधिकारियों का दावा है कि इससे राजधानी की बिजली व्यवस्था प्रदेश के 75 जिलों के लिए मॉडल बनेगी।

261 करोड़ की बिजली सुधार योजना या फिर नया ‘मेगा ठेका महोत्सव’?
करोड़ों खर्च होंगे, लेकिन क्या उपभोक्ताओं को मिलेगी राहत या फिर अगले साल भी सुनाई देंगे वही पुराने बहाने?
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में बिजली सुधार योजना है या फिर करोड़ों रुपये के ठेकों का नया उत्सव?
लखनऊ के उपभोक्ता यह सवाल इसलिए पूछ रहे हैं क्योंकि यह पहला मौका नहीं है जब बिजली व्यवस्था सुधारने के नाम पर करोड़ों रुपये स्वीकृत हुए हैं। पिछले वर्षों में आरडीएसएस, आईपीडीएस, सिस्टम स्ट्रेंथनिंग, रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम और अन्य योजनाओं के तहत अरबों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद हर गर्मी में वही हालात देखने को मिलते हैं—
• ट्रांसफार्मर ओवरलोड हो जाते हैं।
• फीडर ट्रिप करते हैं।
• लो-वोल्टेज की समस्या बनी रहती है।
• घंटों बिजली गुल रहती है।
• उपभोक्ता शिकायत लेकर अधिकारियों के चक्कर लगाते हैं।
आखिर हर साल वही क्षेत्र क्यों बन जाते हैं “संवेदनशील”?
इस बार भी जिन क्षेत्रों के लिए करोड़ों रुपये मंजूर किए गए हैं, उनमें आशियाना, कृष्णानगर, उतरेटिया, गोमती नगर विस्तार, चिनहट, इंदिरा नगर, राजाजीपुरम, विकासनगर, बीकेटी, फैजुल्लागंज और पुराने लखनऊ के कई इलाके शामिल हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पहले हुए कार्य गुणवत्तापूर्ण और दूरदर्शी होते तो आज फिर उन्हीं क्षेत्रों में ट्रांसफार्मर बदलने, क्षमता बढ़ाने और नई लाइनें डालने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
क्या इसका अर्थ यह माना जाए कि पूर्व में खर्च हुए करोड़ों रुपये अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके?
जवाबदेही तय होगी या नहीं?
- तो क्या किसी अभियंता, अधिशासी अभियंता, अधीक्षण अभियंता या मुख्य अभियंता की जिम्मेदारी तय होगी?
- या फिर अगले वर्ष फिर किसी नई योजना के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये की नई मांग प्रस्तुत कर दी जाएगी?
उपभोक्ताओं को चाहिए परिणाम, न कि विज्ञापन
राजधानी का उपभोक्ता अब प्रेस नोट और घोषणाओं से प्रभावित नहीं होता।
उसे चाहिए—
✓ निर्बाध बिजली आपूर्ति।
✓ फाल्ट की घटनाओं में कमी।
✓ ट्रांसफार्मर खराब होने की घटनाओं पर नियंत्रण।
✓ लो-वोल्टेज से मुक्ति।
✓ शिकायतों का त्वरित समाधान।
✓ बिलिंग और आपूर्ति में पारदर्शिता।
यदि 261 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होता तो फिर यह पूरा खर्च जनता के पैसे की बर्बादी माना जाएगा।
यूपीपीसीएल मीडिया का सवाल
अध्यक्ष पावर कारपोरेशन, प्रबंध निदेशक मध्यांचल और चारों जोनों के मुख्य अभियंताओं से यूपीपीसीएल मीडिया जानना चाहता है—
- क्या विभाग यह सार्वजनिक घोषणा करेगा कि 261 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद किन-किन मानकों पर सुधार मापा जाएगा?
- क्या एक वर्ष बाद इसकी समीक्षा रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाएगी?
- और यदि लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?
- 261 करोड़ रुपये जनता के हैं। क्या विभाग प्रत्येक रुपये का हिसाब सार्वजनिक करेगा?
- क्या कार्यों की थर्ड पार्टी जांच होगी?
- क्या कार्य पूरा होने के बाद जोनवार रिपोर्ट जारी की जाएगी?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक उपभोक्ताओं के मन में यह शंका बनी रहेगी कि यह बिजली सुधार योजना है या फिर करोड़ों रुपये के नए ठेकों का एक और महोत्सव।
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या अगले वर्ष गर्मियों में लखनऊ के उपभोक्ता यह कह पाएंगे कि हां, 261 करोड़ रुपये सही जगह खर्च हुए हैं?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह योजना “बिजली सुधार” से अधिक “ठेका उत्सव” दिखाई देती है।
261 करोड़ रुपये का खर्च आखिर किस आधार पर तय हुआ? क्या इसकी स्वतंत्र तकनीकी जांच हुई? क्या जनता को यह बताया जाएगा कि किस कार्य पर कितना खर्च होगा और उसका लाभ कितने उपभोक्ताओं को मिलेगा?
यदि नहीं, तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह बिजली सुधार योजना है या फिर ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए नया आर्थिक अवसर?
लखनऊ के लाखों बिजली उपभोक्ता अब केवल एक बात जानना चाहते हैं—क्या 261 करोड़ खर्च होने के बाद उन्हें निर्बाध बिजली मिलेगी, या अगले साल फिर किसी नई योजना के नाम पर नई घोषणा और पुराने बहाने सुनने को मिलेंगे?

261 करोड़ की बिजली योजना : किस जोन में कितना खर्च और जनता को क्या मिलेगा?
या फिर हर जोन में शुरू होगा नया ठेका खेल?
लखनऊ मध्य जोन : 44.20 करोड़ रुपये
अर्जुनगंज, राजाजीपुरम, तालकटोरा, चौपटिया, रेजीडेंसी, वजीरगंज और पुराने लखनऊ के कई क्षेत्रों में कार्य प्रस्तावित हैं।
दावे क्या हैं?
• 127 नए ट्रांसफार्मर लगाए जाएंगे।
• 29 ट्रांसफार्मरों की क्षमता बढ़ेगी।
• नई 11 केवी लाइनें बिछेंगी।
• कई उपकेंद्रों की लोड क्षमता बढ़ेगी।
जमीनी सवाल
- पुराने लखनऊ में वर्षों से जर्जर लाइनें, ओवरलोड ट्रांसफार्मर और लो-वोल्टेज की समस्या बनी हुई है।
- यदि पहले हुए कार्य सही थे तो आज 127 नए ट्रांसफार्मरों की जरूरत क्यों पड़ रही है?
- क्या विभाग यह बताएगा कि पिछले पांच वर्षों में इसी क्षेत्र में कितने करोड़ रुपये खर्च हुए और उनका परिणाम क्या निकला?
- 44 करोड़ खर्च होने के बाद यदि अगले साल भी चौपटिया, वजीरगंज, राजाजीपुरम और तालकटोरा में ट्रांसफार्मर फुंकते मिले तो जिम्मेदार कौन होगा?
जानकीपुरम जोन : 46 करोड़ रुपये
बीकेटी, विकासनगर, फैजुल्लागंज, विश्वविद्यालय, महानगर, दाउदनगर और आसपास के क्षेत्रों में कार्य होंगे।
दावे क्या हैं?
• नए ट्रांसफार्मर लगेंगे।
• क्षमता वृद्धि होगी।
• नई लाइनें बनाई जाएंगी।
• इक्का स्टैंड उपकेंद्र में 5 एमवीए ट्रांसफार्मर लगेगा।
जमीनी सवाल
- फैजुल्लागंज, विकासनगर और बीकेटी वर्षों से बढ़ते लोड की समस्या झेल रहे हैं।
- क्या यह कार्य भविष्य की मांग को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं या सिर्फ मौजूदा संकट को टालने की कोशिश है?
- 46 करोड़ खर्च होने के बाद क्या विभाग यह गारंटी देगा कि अगले तीन वर्षों तक यहां ओवरलोडिंग की समस्या नहीं होगी?
अमौसी जोन : 75 करोड़ रुपये
यह राजधानी का सबसे बड़ा भौगोलिक क्षेत्र है।
आशियाना, कृष्णानगर, आलमबाग, उतरेटिया, सरोजनीनगर, मोहनलालगंज, मलिहाबाद, माल, नगराम, गोसाईंगंज और निगोहां तक कार्य प्रस्तावित हैं।
दावे क्या हैं?
• 200 से अधिक नए ट्रांसफार्मर।
• 150 से अधिक ट्रांसफार्मरों की क्षमता वृद्धि।
• ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष फोकस।
जमीनी सवाल
- हर वर्ष सबसे अधिक शिकायतें इसी जोन से आती हैं।
- गर्मी में आशियाना, उतरेटिया और कृष्णानगर के उपभोक्ता घंटों बिजली संकट झेलते हैं।
- जब पिछले वर्षों में भी करोड़ों रुपये खर्च हुए तो फिर आज 200 नए ट्रांसफार्मरों की जरूरत क्यों पड़ रही है?
- क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि विभाग समस्या का स्थायी समाधान करने के बजाय हर साल नए उपकरण खरीदने की परंपरा निभा रहा है?
75 करोड़ का यह खर्च जनता के लिए राहत बनेगा या ठेकेदारों के लिए कमाई का नया अवसर?
गोमती नगर जोन : 96 करोड़ रुपये
सबसे अधिक धनराशि इसी जोन को मिली है।
गोमती नगर, गोमती नगर विस्तार, चिनहट, इंदिरा नगर, लौलाई और आसपास के क्षेत्रों में कार्य होंगे।
दावे क्या हैं?
• लौलाई उपकेंद्र की क्षमता बढ़ेगी।
• नया मुर्दहिया उपकेंद्र बनेगा।
• कई उपकेंद्रों का आधुनिकीकरण होगा।
• कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर समाप्त किया जाएगा।
जमीनी सवाल
- 261 करोड़ की पूरी योजना का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा अकेले गोमती नगर जोन को क्यों दिया गया?
- क्या इसलिए कि यहां वीआईपी, वरिष्ठ अधिकारी, मंत्री और प्रभावशाली लोग रहते हैं?
- यदि बिजली व्यवस्था सभी नागरिकों के लिए समान है तो फिर सबसे ज्यादा धन एक ही जोन में क्यों?
- क्या ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ता कम महत्वपूर्ण हैं?
- 96 करोड़ खर्च होने के बाद यदि अगले वर्ष भी गोमती नगर विस्तार, चिनहट और लौलाई में ट्रांसफार्मर ओवरलोड मिले तो क्या किसी अधिकारी पर कार्रवाई होगी?
यदि इन सवालों के जवाब नहीं हैं तो जनता पूछने को मजबूर है कि यह बिजली सुधार योजना है या फिर एक और “ठेका आधारित विकास मॉडल”। लखनऊ के उपभोक्ता अब शिलान्यास और घोषणाएं नहीं, बल्कि परिणाम चाहते हैं।
— यूपीपीसीएल मीडिया
“261 करोड़ खर्च होंगे, लेकिन हिसाब कौन देगा?”








