नोएडा बिजली विभाग में ‘ट्रांसफार्मर कांड’ या प्रशासनिक खेल? पहले निलंबन, फिर हाईकोर्ट से झटका, अब बहाली और कार्यालय अटैचमेंट—आखिर किसकी जिम्मेदारी तय होगी?
जांच में अनियमितता, आरोप पत्र, विवादित निलंबन, हाईकोर्ट से झटका, फिर बहाली … क्या बड़े अधिकारियों को बचाने के लिए नियमों से किया गया खिलवाड़?
नोएडा। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के नोएडा क्षेत्र में सामने आए घटनाक्रमों ने बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नोएडा विद्युत नगरीय वितरण मंडल (तकनीकी) में 25 KVA ट्रांसफार्मर एवं डबल पोल को बिना विभागीय अनुमोदन स्थानांतरित किए जाने के मामले ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक तरफ 25 KVA ट्रांसफार्मर एवं डबल पोल को बिना विभागीय अनुमोदन स्थानांतरित किए जाने का मामला, दूसरी ओर सेक्टर-31 पावर ट्रांसफार्मर प्रकरण, विभागीय जांच, आरोप पत्र, निलंबन, इलाहाबाद हाईकोर्ट का हस्तक्षेप और उसके बाद बहाली—इन सभी घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर नोएडा में नियम चल रहे हैं या रसूख?

UPPCL MEDIA के पास उपलब्ध विभागीय दस्तावेज़ों के अनुसार, सेक्टर-168 स्थित प्राथमिक विद्यालय गुलावली के निकट स्थापित 25 KVA ट्रांसफार्मर एवं डबल पोल को बिना सक्षम विभागीय अनुमोदन स्थानांतरित किए जाने की शिकायत प्राप्त हुई। शिकायत के बाद जांच कराई गई और जांच के आधार पर अवर अभियंता सचिन वर्मा के विरुद्ध आरोप पत्र जारी किया गया। उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया तथा विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रारंभ हुई।
जांच ने उठाए गंभीर सवाल
विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि ट्रांसफार्मर स्थानांतरण निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हुआ। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी कार्यवाही के लिए तकनीकी स्वीकृति, प्रशासनिक अनुमोदन और निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक माना जाता है। जांच के बाद आरोप पत्र जारी होना इस बात का संकेत था कि विभाग ने मामले को गंभीर माना।

लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। बाद में न्यायिक कार्यवाही के बाद विभाग की ओर से सचिन वर्मा की बहाली और कार्यालय से संबद्ध किए जाने का आदेश भी जारी हुआ। इससे सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि यदि निलंबन आदेश अधिकार क्षेत्र के अनुरूप नहीं था, तो ऐसी कार्रवाई की जिम्मेदारी किस अधिकारी की तय होगी?
बिना विभागीय अनुमति ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग का आरोप!
25 केवीए ट्रांसफार्मर व डबल पोल शिफ्टिंग मामले में नोएडा के अवर अभियंता पर आरोप पत्र
विद्युत नगरीय वितरण मंडल (तकनीकी), नोएडा में एक अवर अभियंता पर बिना विभागीय अनुमति 25 केवीए ट्रांसफार्मर एवं डबल पोल को स्थानांतरित कराने के गंभीर आरोप में विभागीय कार्रवाई शुरू हो गई है। उपलब्ध आदेशों के अनुसार संबंधित अभियंता को औपचारिक आरोप पत्र जारी कर निर्धारित समय सीमा में स्पष्टीकरण देने के निर्देश दिए गए हैं।
आरोप पत्र के अनुसार, सोशल मीडिया के माध्यम से प्राप्त शिकायत एवं विभागीय जांच के बाद यह मामला सामने आया। आरोप है कि विभागीय स्वीकृति के बिना ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग कराई गई, जिससे विभागीय नियमों का उल्लंघन हुआ। आदेश में संबंधित स्थल की जांच रिपोर्ट, फोटोग्राफ, लॉगबुक तथा अन्य अभिलेखों का भी उल्लेख किया गया है।
इसके बाद अधीक्षण अभियंता (तकनीकी) ने अधिशासी अभियंता को निर्देशित किया कि आरोप पत्र का विधिवत अनुपालन कराते हुए संबंधित अभियंता से उत्तर प्राप्त किया जाए तथा नियमानुसार आवश्यक विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल ट्रांसफार्मर शिफ्टिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभागीय जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित अभियंता अपने बचाव में क्या स्पष्टीकरण देते हैं और विभाग अंतिम निर्णय क्या लेता है।
निलंबन हुआ… लेकिन अधिकार किसके पास था?
आरोप पत्र के बाद अधीक्षण अभियंता (तकनीकी), नोएडा ने अवर अभियंता सचिन वर्मा को निलंबित कर दिया। यही आदेश आगे चलकर पूरे विवाद का केंद्र बन गया।
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न उठा कि UPPCL Employees (Disciplinary & Appeal) Regulations, 2020 के तहत अधीक्षण अभियंता को अवर अभियंता को निलंबित करने का अधिकार है अथवा नहीं।
न्यायालय की कार्यवाही में यह तथ्य सामने आया कि अधीक्षण अभियंता को ऐसा प्रत्यायोजन (Delegation) उपलब्ध होने का रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बाद न्यायालय ने निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुरूप आगे कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी।
यानी न्यायालय ने ट्रांसफार्मर स्थानांतरण के आरोपों पर कोई राहत नहीं दी, बल्कि केवल निलंबन आदेश की वैधानिकता पर प्रश्न उठाया।
फिर हुई बहाली… लेकिन सवाल खत्म नहीं हुए
- हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद विभाग ने सचिन वर्मा की बहाली कर उन्हें कार्यालय से संबद्ध (अटैच) कर दिया।
- यहीं से विभाग की कार्यशैली पर सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
- यदि निलंबन आदेश अधिकार क्षेत्र के बाहर था, तो ऐसा आदेश जारी क्यों किया गया?
- यदि विभागीय जांच सही थी, तो उसके तार्किक निष्कर्ष तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुंची?
- यदि जांच गलत थी, तो आरोप पत्र क्यों जारी हुआ?
- इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ।
मुख्य अभियंता की भूमिका पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
इसी बीच विभागीय दस्तावेज़ यह भी दर्शाते हैं कि ट्रांसफार्मर स्थानांतरण प्रकरण में आरोप पत्र जारी कर जवाब मांगा गया तथा विभागीय जांच आगे बढ़ाई गई। यदि जांच में नियमों के उल्लंघन के संकेत मिले थे, तो अंतिम निष्कर्ष और उसके आधार पर हुई कार्रवाई सार्वजनिक क्यों नहीं हुई? क्या विभाग ने पूरे मामले का तार्किक अंत तक अनुसरण किया? पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चर्चा मुख्य अभियंता की भूमिका को लेकर रही।
विभागीय हलकों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि—
- जांच रिपोर्ट के बाद अंतिम निर्णय क्या हुआ?
- क्या वरिष्ठ स्तर पर जांच रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा हुई?
- क्या विभागीय कार्रवाई नियमानुसार पूरी की गई?
- क्या पूरे मामले में प्रशासनिक पारदर्शिता बरती गई?
इन सवालों का आधिकारिक उत्तर अब तक सामने नहीं आया है।
सेक्टर-31 ट्रांसफार्मर प्रकरण ने बढ़ाई चिंता
- इसी बीच सेक्टर-31 स्थित पावर ट्रांसफार्मर से जुड़ा मामला भी सामने आया, जिसमें विभागीय स्तर पर कार्रवाई और निगरानी को लेकर कई प्रश्न उठे।
- यदि किसी बड़े पावर ट्रांसफार्मर के रखरखाव या मरम्मत की प्रक्रिया में अनियमितता हुई, तो उसकी जानकारी किस स्तर तक थी?
- यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- यदि जानकारी नहीं थी तो निगरानी व्यवस्था किसके जिम्मे थी?
UPPCL MEDIA INVESTIGATION
अवर अभियंता (JE)
- ✔ बिना विभागीय अनुमोदन ट्रांसफार्मर स्थानांतरण के आरोप में विभागीय जांच।
- ✔ आरोप पत्र जारी।
- ✔ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही।
- ✔ निलंबन।
- ✔ हाईकोर्ट में चुनौती।
अधीक्षण अभियंता (SE)
- ✔ निलंबन आदेश जारी किया।
- ✔ वही आदेश हाईकोर्ट में अधिकार क्षेत्र के विवाद का विषय बना।
- ✔ न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद विभाग को आदेश में बदलाव करना पड़ा।
मुख्य अभियंता (Chief Engineer)
- ✔ पूरे प्रकरण की प्रशासनिक निगरानी का दायित्व।
- ✔ विभागीय जांच के अंतिम निष्कर्ष और कार्रवाई को लेकर उठते प्रश्न।
- ✔ पारदर्शिता और जवाबदेही पर लगातार चर्चा।
UPPCL MEDIA के बड़े सवाल
- 🔴 यदि जांच सही थी तो अंतिम कार्रवाई क्या हुई?
- 🔴 यदि निलंबन गलत था तो जिम्मेदार अधिकारी पर क्या कार्रवाई हुई?
- 🔴 क्या विभागीय नियमों से ऊपर व्यक्तिगत निर्णय चल रहे थे?
- 🔴 क्या नोएडा में विभागीय जवाबदेही सभी स्तरों पर समान रूप से लागू होती है?
- 🔴 क्या भविष्य में ऐसे मामलों की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच होगी?
अब गेंद प्रबंध निदेशक के पाले में
अब पूरे बिजली विभाग की निगाहें पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक पर टिकी हैं। विभागीय जांच, आरोप पत्र, हाईकोर्ट के आदेश और बाद की कार्रवाई को देखते हुए यह अपेक्षा की जा रही है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा कर यह स्पष्ट किया जाएगा कि किस स्तर पर क्या चूक हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार है।
यदि विभाग वास्तव में पारदर्शिता और जवाबदेही की नीति पर चलना चाहता है, तो जांच केवल अधीनस्थ कर्मचारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जहां भी नियमों का उल्लंघन हुआ हो—चाहे वह किसी भी स्तर पर हो—जिम्मेदारी तय होना ही विभाग और उपभोक्ताओं, दोनों के हित में होगा।








