मुरादाबाद में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने बिजली विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संतोष कुमार शर्मा नामक उपभोक्ता ने 16 वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष किया और आखिरकार अदालत ने उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया। यह फैसला केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि विभागीय मनमानी के खिलाफ आम नागरिक की बड़ी जीत माना जा रहा है।
वर्ष 2008 में बिना स्पष्ट कारण बिजली कनेक्शन काट दिया गया। परिवार आठ वर्षों तक अंधेरे में जीवन बिताने को मजबूर रहा। जब पीड़ित ने अपनी आवाज उठाई तो विभागीय अधिकारियों ने समाधान देने के बजाय उसके खिलाफ ही सरकारी कार्य में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज करा दिया। तीन दिन जेल की सलाखों के पीछे भी रहना पड़ा।
मगर अदालत में जब सच सामने आया तो विभाग की पूरी कहानी बिखर गई। विभाग के ही जूनियर इंजीनियर ने स्वीकार किया कि मीटर उतारने के लिए कोई लिखित आदेश नहीं था। दूसरे गवाहों ने भी अभियोजन के दावों को कमजोर कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि कर्मचारी विधिसम्मत तरीके से अपना कार्य कर रहे थे या संतोष शर्मा ने किसी प्रकार का हमला अथवा बल प्रयोग किया था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कार्रवाई वैध थी तो लिखित आदेश कहां था? यदि उपभोक्ता दोषी था तो अदालत ने उसे बरी क्यों किया? और यदि उपभोक्ता निर्दोष था तो उसके 16 वर्ष कौन लौटाएगा?
इस पूरे प्रकरण ने बिजली विभाग की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक परिवार को वर्षों तक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। आठ साल तक बिजली से वंचित रहना पड़ा, मुकदमे झेलने पड़े और जेल भी जाना पड़ा। आखिर इस अन्याय का जिम्मेदार कौन है?
अब संतोष कुमार शर्मा ने संबंधित जेई, एसडीओ, विवेचक और कार्रवाई में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है। यदि ऐसा होता है तो यह मामला विभागीय जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
यूपीपीसीएल मीडिया का सवाल:
क्या गलत कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी?
क्या पीड़ित परिवार को मुआवजा मिलेगा?
और क्या बिजली विभाग भविष्य में ऐसे मामलों से सबक लेगा या फिर आम उपभोक्ता इसी तरह तंत्र की मनमानी का शिकार होता रहेगा?
“16 साल की लड़ाई ने साबित कर दिया कि सच देर से सही, लेकिन जीतता जरूर है।”








