बाराबंकी/सिद्धौर | UPPCL MEDIA
बाराबंकी के सिद्धौर नगर पंचायत के पश्चिम कटरा में सोमवार को एक दर्दनाक और शर्मनाक घटना सामने आई, जहां खुले में रखे विद्युत ट्रांसफार्मर की चपेट में आकर राष्ट्रीय पक्षी मोर गंभीर रूप से घायल हो गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि घायल मोर को बचाने के लिए ग्रामीण, सभासद और बिजली कर्मचारी तो सक्रिय दिखे, लेकिन जिम्मेदार विभागों की संवेदनहीनता ने आखिरकार उसकी जान ले ली।
जानकारी के अनुसार, सिद्धेश्वर वार्ड के सभासद एवं विश्व हिंदू महासंघ के जिलाध्यक्ष दीप्तांशु निगम ने ग्रामीणों के साथ मिलकर घायल मोर को बचाने का प्रयास किया। स्थानीय लाइनमैन महबूब आलम और शाह आलम ने बिजली आपूर्ति बंद कराकर मोर को ट्रांसफार्मर से सुरक्षित बाहर निकलवाया।
लेकिन सवाल यह है कि अगर ट्रांसफार्मर सुरक्षित और जालीयुक्त होता तो क्या राष्ट्रीय पक्षी की जान जाती?
घटना की सूचना वन विभाग को सुबह ही दे दी गई थी, लेकिन करीब 10 बजे तक कोई कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा। वहीं स्थानीय पशु चिकित्सालय में भी चिकित्सक मौजूद नहीं थे। इलाज के अभाव में मोर ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
ग्रामीणों का आरोप है कि यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं बल्कि विभागीय लापरवाही से हुई मौत है। खुले ट्रांसफार्मर, वन विभाग की देरी और पशु चिकित्सा व्यवस्था की नाकामी ने मिलकर राष्ट्रीय पक्षी की जान ले ली।
अब बड़ा सवाल यह है कि:
- खुले ट्रांसफार्मरों को सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी किसकी है?
- सूचना मिलने के बाद वन विभाग समय पर क्यों नहीं पहुंचा?
- पशु चिकित्सालय में चिकित्सक अनुपस्थित क्यों थे?
- राष्ट्रीय पक्षी की मौत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
हरख रेंज के रेंजर प्रदीप सिंह ने मोर की मौत की पुष्टि करते हुए पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया की बात कही है, लेकिन ग्रामीण पूछ रहे हैं कि “मौत के बाद की कार्रवाई से क्या मोर वापस आ जाएगा?”
UPPCL MEDIA का सवाल:
जब एक राष्ट्रीय पक्षी को समय पर इलाज और सुरक्षा नहीं मिल सकती, तो आम नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जिम्मेदार विभागों को जवाब देना होगा कि आखिर यह मौत दुर्घटना थी या लापरवाही का परिणाम?








