उत्तर प्रदेश सरकार की बहुचर्चित बिजली राहत योजना 2025–26 को आम उपभोक्ताओं के लिए बड़ी सौगात के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। योजना का संचालन उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है, जिसमें 100 प्रतिशत सरचार्ज माफी, मूलधन में चरणबद्ध छूट और किस्तों पर अतिरिक्त रियायत देने की घोषणा की गई है।

योजना की शर्तें बनाम ज़मीनी सच्चाई
बताते चले कि उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा लागू बिजली राहत योजना 2025–26 को सरकार की महत्वाकांक्षी पहल बताया जा रहा है। योजना के तहत उपभोक्ताओं को 100% सरचार्ज माफी, मूलधन में प्रथम चरण 25%, द्वितीय चरण 20%, तृतीय चरण 15% तक की छूट, साथ ही 700 की किस्त पर 10% और 500 की किस्त पर 5% अतिरिक्त राहत देने का दावा किया गया है।
लेकिन इन लाभों को पाने के लिए जिस जागरूकता, प्रचार और डिजिटल पहुंच की जरूरत है, वह ग्रामीण क्षेत्रों में पूरी तरह नदारद है।
काग़ज़ों में यह योजना जितनी आकर्षक है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यह “राहत योजना” कई ग्रामीण उपकेंद्रों के लिए राहत नहीं, बल्कि काल बनती जा रही है।
जागरूक उपकेंद्रों को इनाम, गरीब उपकेंद्रों को सज़ा
जहाँ उपभोक्ता जागरूक हैं या संख्या कम है, वहाँ लक्ष्य पूरे होने पर पुरस्कार तय हैं, लेकिन जिन उपकेंद्रों में उपभोक्ता अशिक्षित, गरीब और संख्या में अधिक हैं, वहाँ न संसाधन हैं, न सहयोग—और सारा दबाव फील्ड स्टाफ पर।
पहला बड़ा कारण: प्रचार के लिए पैसा ही नहीं
मान लीजिए किसी एक उपकेंद्र पर 15,000 उपभोक्ता हैं, तो यह जानने का प्रयास करते है, कि किस मद में कितना खर्च आ रहा है?
👉 नोटिस छपाई: ₹2 प्रति नोटिस
→ 15,000 × 2 = ₹30,000
👉 नोटिस वितरण: न्यूनतम ₹5 प्रति उपभोक्ता
→ 15,000 × 5 = ₹75,000
👉 3 माह का प्रचार (₹500 प्रतिदिन)
→ 500 × 90 = ₹45,000
नोटिस वितरण व 3 माह का प्रचार पर आने वाला कुल खर्च = ₹1.5 लाख …. जबकि जबकि इस मद में एक खंड को मात्र ₹1 लाख दिए गए हैं और हर ग्रामीण खंड में 6–7 उपकेंद्र हैं।
नतीजा साफ है कि पैसे के अभाव में योजना हर उपभोक्ता तक पहुँच ही नहीं पा रही।
दूसरा बड़ा कारण: ग्रामीण हकीकत बनाम डिजिटल दावे
ग्रामीण इलाकों में अधिकांश लोग पढ़े-लिखे नहीं, आर्थिक रूप से कमजोर हैं। वे महीने के अंत में पैसा जोड़कर पावर हाउस पहुँचकर बिल जमा करना ही सुरक्षित मानते हैं।
विडंबना यह है कि पावर हाउस पर हेल्प डेस्क नहीं है, बिलिंग काउंटर नहीं है, पूरी व्यवस्था संविदा स्टाफ और सीएससी के भरोसे चल रही है।
अब कल्पना कीजिए कि जब 15,000 उपभोक्ताओं में से 30% (4,500) अगर 20 तारीख के बाद आते हैं, तो एक दिन में 450 लोग एक पावर हाउस पर पहुँचेंगे। अब विभाग खुद ही बताये कि क्या वहाँ इतनी व्यवस्था है?
हकीकत यह है कि प्रथम चरण में 200 लोगों के आने पर ही लोगों को 4–5 घंटे लाइन में लगना पड़ा। यही है बिजली विभाग की तथाकथित डिजिटल व्यवस्था।

न चाहते हुए भी इस विषय में यूपीपीसीएल मीडिया का निःशुल्क अमूल्य सुझाव
(यदि सच में योजना सफल करनी है, तो)
👉 प्रत्येक उपकेंद्र को उसके उपभोक्ताओं की संख्या के अनुसार (कम से कम उपभोक्ताओं की संख्या का 10 गुना बजट) धन दिया जाए।
👉 ओटीएस के नाम पर उपभोक्ताओं से ₹15 प्रति कनेक्शन लिया जा सकता है।
👉 ऑनलाइन ओटीएस प्रक्रिया सरल की जाए, केवल AC नंबर + मोबाइल नंबर से
ओटीएस रजिस्ट्रेशन
👉 फुल पेमेंट / किस्त—दोनों विकल्प
👉 वर्तमान जटिल और उलझी हुई ओटीएस रजिस्ट्रेशन प्रणाली को तुरंत बदला जाए
सवाल यह है—जवाब कौन देगा?
क्या यह ‘राहत योजना’ थी या फिर सरकारी धन के खुले अपव्यय का प्रयोग?
पावर कॉरपोरेशन के अंतर्गत सभी डिस्कॉमों के अधीनस्थ हजारों सब स्टेशनों की संख्या के अनुपात में यदि बिजली राहत योजना मद में जारी किए गए ₹1 लाख प्रति सब स्टेशन की गणना की जाए, तो यह सवाल खुद-ब-खुद खड़ा हो जाता है कि आखिर इस मद में कुल कितनी करोड़ रुपये की धनराशि आंख मूंदकर खर्च कर दी गई?
और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि—
- क्या इस पैसे से उपभोक्ता तक योजना पहुँची?
- क्या ग्रामीण उपभोक्ता को राहत मिली?
- या फिर यह पूरी राशि केवल आदेशों, फाइलों और रिपोर्टों में ही निपटा दी गई?
जिन अधिकारियों ने इस मद में दिशा-निर्देश जारी किए, वे यह बताने से क्यों बच रहे हैं कि—
- किस सब स्टेशन पर कितना पैसा वास्तव में खर्च हुआ?
- कितने उपभोक्ताओं तक योजना की जानकारी पहुँची?
- किस आधार पर ₹1 लाख की एक-सी राशि छोटे और बड़े सब स्टेशनों पर थोप दी गई?
यदि जवाब नहीं हैं, तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है—
- क्या इस पूरी योजना की निष्पक्ष ऑडिट कराई जाएगी?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
- या फिर करोड़ों की यह रकम भी बाकी योजनाओं की तरह खामोशी में दफन कर दी जाएगी?
जनता जानना चाहती है।
- ग्रामीण उपभोक्ता जवाब मांग रहा है।
- और अब चुप्पी भी एक अपराध बनती जा रही है।
पावर कारपोरेशन के अंतर्गत सभी डिस्कॉमों के अधीनस्थ सब स्टेशनों की संख्या के अनुपात में बिजली राहत योजना मद में प्रति सब स्टेशन ₹1 लाख जारी किए गए।
यदि इन सब स्टेशनों की कुल संख्या के आधार पर गणना की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इस मद में करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए।
सवाल यह है—
- क्या यह राशि वास्तव में उपभोक्ताओं तक योजना पहुँचाने में खर्च हुई?
- क्या ग्रामीण उपभोक्ताओं को इसका कोई ठोस लाभ मिला?
- या फिर यह पैसा केवल आदेशों, फाइलों और कागज़ी रिपोर्टों तक ही सीमित रहा?
छोटे और बड़े, कम उपभोक्ता वाले और हजारों उपभोक्ताओं वाले सभी सब स्टेशनों को एक समान राशि देना किस तर्क पर आधारित था?
- न प्रचार व्यवस्था बनी,
- न जागरूकता फैली,
- न ही भीड़ और अव्यवस्था पर कोई नियंत्रण हुआ।
अब सबसे बड़ा सवाल—
- क्या इस पूरी राशि की निष्पक्ष जांच और ऑडिट होगी?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?
जनता जानना चाहती है यह “राहत” किसे मिली और पैसा कहाँ गया?
चुप्पी अब सवाल बन चुकी है…
अगर यही हाल रहा, तो बिजली राहत योजना 2025–26…राहत नहीं, ग्रामीण उपकेंद्रों के लिए संकट बनकर रह जाएगी। काग़ज़ों में तारीफ़ और ज़मीन पर अव्यवस्था— यही इस “महत्वाकांक्षी योजना” की सबसे बड़ी सच्चाई है।








