होली से पहले ‘सस्पेंशन स्ट्राइक’! गोमती नगर जोन में इंजीनियरों पर गिरी गाज, क्या बलि का बकरा बन रहे अधिकारी?

हादसा एक, निलंबन चार — सिस्टम बेदाग या जिम्मेदारी से बचने की कवायद?

गोमती नगर जोन में गिरी गाज: अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता निलंबित, JE व TG2 पर भी कार्रवाई

लखनऊ। कल्याणपुर क्षेत्र में 33 केवी लाइन पर देर रात मरम्मत कार्य के दौरान संविदाकर्मी लाइनमैन परशुराम की करंट लगने से हुई मौत ने पूरे गोमती नगर जोन को झकझोर दिया। प्रारंभिक चर्चाओं में शटडाउन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे—क्या वास्तव में लाइन आइसोलेट की गई थी? क्या यार्ड ओपनिंग और ग्राउंडिंग की औपचारिकताएं पूरी हुई थीं? या संचार की चेन कहीं टूटी?

हादसे के तुरंत बाद जमीनी स्तर पर इंजीनियरों ने मृतक परिवार के साथ खड़े होकर सहयोग किया। स्थानीय पुलिस प्रशासन ने भी संवेदनशीलता दिखाई। संविदा कर्मियों की एकजुटता ने मानवीय पक्ष को मजबूत किया।

लेकिन 28 फरवरी 2026 को जारी आदेशों ने कहानी की दिशा बदल दी। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने 33 केवी सेक्टर-4, गोमती नगर विस्तार के अधिशासी अभियंता प्रीतम सिंह और 33 केवी इंदिरानगर के सहायक अभियंता अमितेश सिंह को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। साथ ही अवर अभियंता धर्मेंद्र कुमार और टीजी-2 राम धीरज पर भी कार्रवाई हुई। आदेश पर हस्ताक्षर प्रबंध निदेशक रिया केजरीवाल के हैं।

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आदेश की भाषा सख्त, जवाब अधूरे

आदेश में “सेफ्टी प्रोटोकॉल की अनदेखी”, “कर्तव्यों में शिथिलता” और “घोर लापरवाही” जैसे शब्द दर्ज हैं। प्रश्न यह है—क्या तकनीकी जांच पूरी हो चुकी है? क्या शटडाउन कन्फर्मेशन की चेन ऑफ कमांड का फॉरेंसिक ऑडिट हुआ?

33 केवी लाइन पर कार्य बहु-स्तरीय प्रक्रिया है—शटडाउन परमिशन, कंट्रोल रूम कन्फर्मेशन, यार्ड आइसोलेशन, अर्थिंग, साइट सुपरविजन। यदि किसी स्तर पर चूक हुई, तो क्या वह केवल चार व्यक्तियों की व्यक्तिगत विफलता है? या वर्टिकल प्रणाली के बाद पैदा हुई समन्वयहीनता और कार्य-दबाव का परिणाम?

वर्टिकल प्रणाली: दबाव, दायित्व और दुर्घटना

विभाग ने वर्टिकल मॉडल लागू किया—जिम्मेदारियां पुनर्गठित हुईं, रिपोर्टिंग लाइन्स बदलीं, फील्ड और कमर्शियल कार्यों का विभाजन कड़ा हुआ। जमीनी स्तर से लंबे समय से समन्वय की कमी, स्टाफ शॉर्टेज और आदेश-आधारित दबाव की शिकायतें आती रही हैं।

मानव संसाधन प्रबंधन के सिद्धांत साफ कहते हैं—अत्यधिक दबाव, अस्पष्ट जवाबदेही और संसाधनों की कमी दुर्घटना-जोखिम बढ़ाती है। यदि सिस्टम-डिजाइन में खामी है, तो उसका ऑडिट क्यों नहीं?

त्योहार से पहले ‘सस्पेंशन स्ट्राइक’

होली से ठीक पहले सामूहिक निलंबन ने पूरे जोन का मनोबल प्रभावित किया है। निलंबन के बाद 33 केवी नेटवर्क की जिम्मेदारी सीमित अधिकारियों पर आ गई है। क्या वैकल्पिक तकनीकी तैनाती हुई? क्या रिस्क असेसमेंट अपडेट हुआ?

यदि कल फिर कोई चूक होती है, तो अगला आदेश किसके नाम होगा?

मानवीय और सामाजिक आयाम

निलंबन केवल प्रशासनिक शब्द नहीं—यह आर्थिक और सामाजिक आघात है। वेतन-भत्ता सीमित, स्थानांतरण की आशंका, बच्चों की पढ़ाई, बैंक लोन—सब पर असर। क्या दंडात्मक कार्रवाई से पहले यह आकलन हुआ?

करारा सवाल विभाग से

  • क्या निष्पक्ष, समयबद्ध तकनीकी जांच सार्वजनिक की जाएगी?
  • क्या शटडाउन प्रोटोकॉल और कम्युनिकेशन चेन का सिस्टम ऑडिट होगा?
  • क्या वर्टिकल मॉडल की खामियों की समीक्षा की जाएगी?
  • या फिर “निलंबन” ही जवाबदेही का अंतिम मॉडल है?

हादसा दुखद है, जवाबदेही अनिवार्य है। लेकिन यदि हर बार सिस्टम की सर्जरी की जगह व्यक्ति-विशेष पर गाज गिरती रही, तो सुधार नहीं—सिर्फ प्रतीकात्मक सख्ती दिखेगी।

ऊर्जा विभाग को तय करना होगा—क्या वह वास्तविक कारणों की परतें खोलेगा, या हर दुर्घटना के बाद एक और आदेश जारी कर अपने ही इंजीनियरिंग ढांचे पर तमाचा मारता रहेगा।

UPPCL Media | विशेष रिपोर्ट

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    "यूपीपीसीएल मीडिया" ऊर्जा से संबंधित एक समाचार मंच है, जो विद्युत तंत्र और बिजली आपूर्ति से जुड़ी खबरों, शिकायतों और मुद्दों को खबरों का रूप देकर बिजली अधिकारीयों तक तक पहुंचाने का काम करता है। यह मंच मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में बिजली निगमों की गतिविधियों, नीतियों, और उपभोक्ताओं की समस्याओं पर केंद्रित है।यह आवाज प्लस द्वारा संचालित एक स्वतंत्र मंच है और यूपीपीसीएल का आधिकारिक हिस्सा नहीं है।

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