मध्यांचल की कार्य प्रणाली से प्रणाली से यदि किसी की जीविकोत्पार्जन खत्म हो जाए, तो इसमें सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन होगा?

एक व्यक्ति अपने परिवार के जीवन यापन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करके व लोन लेकर अपने कार्य को शुरू करता है और उसे कार्य में बिजली विभाग शनि की काली दृष्टि पड़ जाए तो आप ही अंदाजा लगा लीजिए की क्या हो सकता है??

परिवार के जीवन यापन के लिए सपने सजाए एक व्यक्ति प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी योजना रोजगार सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत लोन लेकर अपने व्यवसाय को शुरू करता है… और विभाग उसमें गलत बिलिंग करना शुरू कर दे यानी कि ग्रामीण क्षेत्र की बिलिंग होने के बजाय शहरी क्षेत्र की बिलिंग करना शुरू कर दे और उसको सही करने के बजाय उपभोक्ता को परेशान करें… यह तो विभाग के लिए सोने पर सुहागा जैसी बात होगी लेकिन व्यापारी के लिए क्या उसकी तो जीविका ही चली गई इसका जिम्मेदार कौन?

उपभोक्ता और बिजली विभाग की रोज-रोज की कच कच को देखते हुए मकान मालिक अपना मकान खाली कर लेता है, उसके उपरांत उपभोक्ता दूसरा मकान लेता है… उसी जगह, उसी पोल से अब उसको लाइन शिफ्टिंग के लिए सभी प्रक्रिया पूरी होने के उपरान्त भी कई महीनो से विभाग का चक्कर लगाना हो रहा हो, हर महीने का बैंक किस्त… हर महीने का किराया… बिना रोजगार के एक व्यक्ति कैसे दे सकता है क्या यह सरकार या विभाग बताएगी?? ऐसी हालत में अगर उपभोक्ता द्वारा कोई गलत कदम उठा लिया जाता है तो क्या उसके परिवार को विभाग या सरकार जीवन यापन करेगी??

यह मामला मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड अन्तगर्त शाहजहांपुर का है, जहां रामनगर कालोनी बण्डा, तहसील पुवायां निवासी उपभोक्ता सतेन्द्र कुमार (खाता संख्या-0007497000) अपने व्यवसाय क्षेत्र ताजपुर (बण्डा) में अपने जीविकोत्पार्जन हेतु प्रशिक्षण प्राप्त करके व ऋण लेकर प्रधानमंत्री के रोजगार सृजन कार्यक्रम अन्तर्गत बर्फ खाना यूनिट शुरू किया, यह यूनिट सूक्ष्म एवं लघु यूनिट में आता है। यह यूनिट ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है, उपरोक्त यूनिट का संयोजन होने के उपरान्त ये ही विभाग द्वारा उपरोक्त यूनिट का बिल ग्रामीण टैरिफ दर से न होकर शहरी टैरिफ दर से बनने के कारण बिल हजारों में बनने के वजाय कई लाखों में बन जाने के कारण अपना कार्य छोड़ते हुए विभाग का चक्कर लगाना शुरू किया, लगभग एक साल तक विभाग का चक्कर लगाने के उपरान्त निराश उपभोक्ता मान्नीय न्यायालय की शरण में चला गया, जिस पर विभाग में अपनी गलती सुधारने के लिए मीटर ही उतार लिया।

उपभोक्ता और बिजली विभाग की रोज-रोज की कच कच को देखते हुए मकान मालिक अपना मकान खाली करा लिया. उपरोक्त यूनिट एकमात्र उपभोक्ता के परिवार की जीविका का साधन था, विभाग द्वारा बिल में की गई त्रुटियां के कारण यूनिट के स्थान को खाली करना पड़ा, जिसके उपरान्त उपभोक्ता ने लगभग 30-40 मीटर की दूरी पर परिसर के सामने दूसरी जगह लेकर विभाग में प्रार्थना पत्र व स्थानान्तरण सम्बन्धी समस्त दस्तावेज जमा करने के उपरान्त विभाग उपभोक्ता से नये सिरे से कन्नेशन का आवेदन के लिए कहती है, लेकिन उपभोक्ता की स्थिति नये कन्नेयान लेने की नहीं है, जबकि उपभोक्ता के पास बनी हुई विद्युत लाइन, पोल, ट्रांसफार्मर उपलब्ध है, विभाग को सिर्फ प्रोसेस एवं मीटर कास्ट फीस जमा कराकर बिजली की तार की दिशा परिवर्तन करके नया मीटर लगा देना है.. जिसके लिए भी उपभोक्ता का लगभग छह माह से विभाग का चक्कर लगाना पड रहा है।

उपभोक्ता और विभाग की पेचीदा पेच से कनेक्शन स्थानान्तरित न होने के कारण यूनिट लगभग बन्द हो गई है, यूनिट के ऋण का पैसा भी बैंक को वापस नही हो सकेगा, जबकि यह यूनिट ही उपभोक्ता के परिवार व बच्चों की जीविका का एकमात्र साधन है, ऐसी हालत में अगर उपभोक्ता द्वारा कोई गलत कदम उठा लिया जाता है, तो क्या उसके परिवार की जिम्मेदारी कौन लेगा??

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