वसूली में सख्त… टैक्स देने में ढीले!
पावर कॉरपोरेशन के दफ्तरों पर ₹5 करोड़ से अधिक का हाउस टैक्स बकाया
लखनऊ। प्रदेश भर में उपभोक्ताओं से बिजली बिल की वसूली में सख्ती दिखाने वाला बिजली विभाग अब खुद ही सवालों के घेरे में आ गया है। राजधानी लखनऊ में नगर निगम के दस्तावेज़ों ने खुलासा किया है कि पावर कॉरपोरेशन के कई कार्यालयों पर करोड़ों रुपये का हाउस टैक्स बकाया है।

नगर निगम लखनऊ के जोन-1 से जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के 13 भवनों पर कुल ₹5,01,35,577.36 (करीब पाँच करोड़ रुपये) का हाउस टैक्स बकाया चल रहा है। नगर निगम ने अधिशासी अभियंता को पत्र लिखकर बकाया राशि का भुगतान कराने के निर्देश दिए हैं।

दस्तावेज़ में शामिल भवनों में शक्ति भवन परिसर के विभिन्न भवन, मध्यांचल भवन, मुख्य अभियंता वितरण कार्यालय, अधिकारी फील्ड हॉस्टल, अधिकारी आवास सहित कई महत्वपूर्ण कार्यालय शामिल हैं।
सिर्फ एक जोन का आंकड़ा, तो हजारों भवन… तो कितना होगा कुल बकाया?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह आंकड़ा केवल नगर निगम लखनऊ के जोन-1 का है। राजधानी के एक ही जोन में यदि पाँच करोड़ रुपये से अधिक का हाउस टैक्स बकाया है, तो पूरे प्रदेश में बिजली विभाग और उससे जुड़े परिसरों का कुल बकाया कितना होगा, यह बड़ा सवाल बन गया है।


उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण का संचालन UPPCL के अधीन चार वितरण कंपनियों — मध्यांचल, पश्चिमांचल, पूर्वांचल और दक्षिणांचल — के माध्यम से होता है। इन कंपनियों के अंतर्गत पूरे प्रदेश में हजारों संस्थान और कार्यालय संचालित होते हैं। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में लगभग:
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4500 के आसपास 33/11 kV उपकेंद्र
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लगभग 20 मुख्य अभियंता कार्यालय
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75–80 अधीक्षण अभियंता कार्यालय
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240–260 अधिशासी अभियंता कार्यालय
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10–12 प्रशिक्षण संस्थान
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25–35 वर्कशॉप
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70–100 मीटर संबंधी कार्यालय
ऐसे में सवाल उठता है कि जब एक ही जोन में लाखों रुपये का बकाया निकल रहा है, तो पूरे प्रदेश के हजारों कार्यालयों का वास्तविक बकाया कितना होगा?
उपभोक्ताओं पर सख्ती, खुद पर ढील क्यों?
बिजली विभाग आम उपभोक्ताओं पर बकाया होने पर कनेक्शन काटने, नोटिस जारी करने और रिकवरी की सख्त कार्रवाई करता है। आम उपभोक्ताओं पर बकाया होने पर कनेक्शन काटने और रिकवरी की सख्त कार्रवाई करने में देर नहीं करता। लेकिन जब मामला खुद विभाग और उसके परिसरों के टैक्स भुगतान का आता है, तो भुगतान वर्षों तक लंबित रहता है।
यह स्थिति न केवल प्रशासनिक जवाबदेही बल्कि वित्तीय अनुशासन पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या पावर कॉरपोरेशन के शीर्ष अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर बकाया भुगतान सुनिश्चित करेंगे, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।








