इलाज के पैसों पर रिश्वत की दरें तय — कम दो तो फ़ाइल सोए, ज़्यादा दो तो फ़ाइल दौड़े
ऊर्जा विभाग के ट्रांसमिशन दफ्तर में एक शर्मनाक सच सामने आया है। कर्मचारियों के सीपीएफ खाते से बच्चों के इलाज या पारिवारिक आपात ज़रूरत के लिए पैसे निकलवाने की प्रक्रिया को कथित तौर पर रिश्वत की सीढ़ी बना दिया गया। आरोप है कि ZAO Transmission Office, Lucknow में बिना “सेटिंग” के फ़ाइल आगे नहीं बढ़ती। रकम कम हो तो फ़ाइल ठंडी, रकम ज़्यादा हो तो फ़ाइल गरम—और इस खेल में हिस्सा ऊपर तक बंटने की चर्चा।
ऊर्जा विभाग के ट्रांसमिशन दफ्तर से जो तस्वीर उभरी है, वह सिस्टम की संवेदनहीनता का नंगा सच है। कर्मचारियों के सीपीएफ से बच्चों के इलाज और आपात ज़रूरत के लिए पैसा निकालना भी कथित तौर पर रिश्वत की शर्तों पर टिका है। आरोप है कि ZAO Transmission Office, Lucknow में बिना “नज़राना” दिए फ़ाइल आगे नहीं बढ़ती—रकम के हिसाब से रफ़्तार तय होती है।

शिकायत पर बनी जांच समिति ने एक लेखा लिपिक को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी पाया। इसके बाद निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन), ट्रांसमिशन, शक्ति भवन, लखनऊ ने तत्काल प्रभाव से निलंबन कर दिया। आदेश में इस कृत्य को घोर कदाचार बताया गया है और सख्त अनुशासनिक कार्रवाई की बात दर्ज है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जांच में यह भी संकेत हैं कि कुछ कार्मिकों ने काम में जानबूझकर देरी, डराने-धमकाने और कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956 का उल्लंघन किया। ऐसे नामों पर चार्जशीट की तैयारी है।
अब बड़ा सवाल विभाग के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है—
क्या कर्मचारी अपने ही पैसे पाने के लिए भी दलाली देंगे?
क्या बीमारी और मजबूरी को भी ‘मौका’ समझा जाएगा?
मामला ऊपर तक गूंज चुका है। निगाहें इस पर हैं कि कितनों की जवाबदेही तय होगी और क्या यह कार्रवाई सिस्टम में जमी दलाली की जड़ों तक पहुंचेगी।
यूपीपीसीएल मीडिया इस प्रकरण पर पैनी नज़र रखे हुए है। सच सामने आ चुका है—अब बारी है जवाबदेही की।







