बेबाक: अपने-अपने निहित स्वार्थ में विकलांग हुये कार्मिक संगठन, बौने बने ऊर्जा निगमों के वरिष्ठ अभियन्ता!

मित्रों नमस्कार! पहले एक कूटनीतिक चाल के तहत Memorandum of Article को धता बताते हुये, ऊर्जा निगमों में थोपे गए बाहरी प्रबंध निदेशक एवं अध्यक्ष। अब एक कदम और आगे बढ़ते हुये, अपने कार्मिकों के लिये मुख्य अभियन्ता एवं 30 वर्ष के अनुभव की शर्त और बाहरी व्यक्तियों के लिये मात्र 15 वर्ष का अनुभव रखकर, ऊर्जा निगमों के कार्मिकों को हतोत्साहित करने एवं अपमानित करने का यथासंभव प्रयास किया जा रहा है। जिसके लिये कहीं न कहीं, हम सभी उत्तरदायी हैं। यदि सेवाकाल के अनुसार बाहरी एवं ऊर्जा निगमों के कार्मिको की आयु की गणना की जाये तो जहां बाहरी लोगों की औसत आयु 40 वर्ष से ज्यादा नहीं होगी, तो वहीं विभागीय आवेदकों की आयु लगभग 60 वर्ष होगी।

ऐसा प्रतीत होता है कि जिस किसी ने भी निदेशक पद के लिये 15 एवं 30 वर्ष का अनुभव निर्धारित किया है, उसके मन में निगम के अधिकारियों के प्रति कहीं न कहीं बहुत कड़वाहट भरी हुई है तथा उसका उद्देश्य ही ऊर्जा निगमों के कार्मिकों को हतोत्साहित कर, उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हुये अपमानित करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। क्योंकि जहां एक ओर ऊर्जा निगमों का अभियन्ता/कार्मिक, जिन विषमतः परिस्थितियों में कार्य करता है, वहां बाहरी व्यक्ति को उन विषमतः परिस्थितियों का अहसास तक नहीं होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि एक तकनीकी संस्थान में योग्यता और ऊर्जा को पूर्णतः समाप्त कर, उसको विकलांग कर, बाहरी बैशाखियों पर लाने का कोई षडयन्त्र किया जा रहा है। आईये बचपन मे पढ़ी एक कहानी आपको सुनाता हूं। एक राजा के दो राजकुमार, गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब अपने गुरुदेव के साथ वापस महल में आते हैं, तो अचानक गुरु जी को याद आता है कि उनकी एक आखिरी शिक्षा तो शेष रह गई है। अतः गुरुजी, राजकुमारों को अन्तिम शिक्षा देने के लिये महल से वापस जंगलों में ले जाकर, उन्हें एक वृक्ष से बान्धकर, दोनों को कोड़े से बुरी तरह से पीट-पीटकर लहु-लुहान कर देते हैं। कोड़ों की मार से लहु-लुहान राजकुमार गुरुजी से प्रश्न करते हैं कि उन्हें यह किस अपराध की सजा दी गई है। तो गुरु जी उन्हें बताते हैं कि यही उनकी अन्तिम एवं अनिवार्य शिक्षा थी। क्योंकि जब वे किसी को दण्ड प्रदान करेंगे, तो उन्हें अपराधी के दर्द का अहसास नहीं होगा, जिसके कारण दण्ड की मात्रा तय कर पाना सम्भव नहीं होगा और वे उचित न्याय नहीं कर पायेंगे। अतः आज की शिक्षा के बाद ये दर्द उन्हें न्याय करने हेतु, दण्ड की उचित मात्रा निर्धारित करने में सहायक होगा और वे उचित न्याय कर सकेंगे।

इसी प्रकार से उत्तर प्रदेश के ऊर्जा निगमों के कार्मिकों को आये दिन घेराव, गाली-गलौच एवं मारपीट तक से समय-समय पर सामना करना पड़ता है तथा जहां उन्हें विषमतः परिस्थितियों में भी अपना बचाव एवं निगम हितों की रक्षा शान्तिपूर्वक करनी पड़ती है। जबकि बाहरी व्यक्ति को उपरोक्त कथित परिस्थितियों का लेशमात्र भी अनुभव नहीं होता। जिसके कारण उनसे उचित न्याय की उम्मीद करना बेईमानी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। स्पष्ट है कि जब प्रबन्धन में बैठे अधिकारियों को इस बात का अहसास तक नही होगा, कि ऊर्जा निगमों के कार्मिक कितनी विषम परिस्थितियों में और कितने दबाव में कार्य करते हैं, तो उचित टीम भावना के साथ, उचित न्याय कर पाना सम्भव नहीं होगा। NTPC एवं PSUs/Corporate में कार्यरत् अधिकारियों को, उपभोक्ता देवोभवः की आड़ में साक्षात काल देखने का कोई अनुभव नहीं होता है। ऐसे व्यक्तियों का चुनाव, जिन्हें भौगोलिक एवं क्षेत्रीय परिस्थितियों का ही कोई ज्ञान ही न हो, ऊर्जा निगमों के लिये कदापि उचित नहीं है। ऐसे अनुभवहीन अधिकारियों को अपने अनुभवी अभियन्ताओं पर वरीयता देकर, निदेशक बनाना, ऊर्जा निगमों की रीढ़ पर चोट मारने के समान है।

बेबाक बार-बार यह कहता रहा है कि ऊर्जा निगमों में योग्यता की कोई कमी नहीं है, बस उसके उपयोग की आवश्यकता है। जिसे चाटुकारों एवं दलालों ने एक किनारे लगाया हुआ है। यही कारण है कि आज ऊर्जा निगमों में योग्यता पर ”अन्य काबिलियत“ भारी है। जिसका जीता जागता उदाहरण निदेशकों के लिये एक ओर अनुभव में दुगने का अन्तर और दूसरी ओर अधिकतम आयु सीमा 62 से 65 करके, किसी विशेष सिफारिशी/योग्य को निदेशक बनाने का मार्ग प्रशस्त करना है।। किसी भी संस्थान में विभागीय एवं कार्मिक हितों के रक्षार्थ कार्मिक संगठन होते हैं। परन्तु यह ऊर्जा निगमों का दुर्भाग्य है कि कार्मिक संगठनों के पदाधिकारी निहित स्वार्थ में इस कदर जकड़े हुये हैं कि उन्हे न तो विभाग से मतलब है और न ही अपने सदस्यों के हितों से। उनमें अनिवार्य कूटनीतिक ज्ञान की जगह अकड़ और अहंकार इस कदर भरा हुआ है, कि उन्हें सत्य दिखलाई देना ही बन्द हो चुका है। परिणामतः कार्मिक संगठनों के सर्वोच्च पदाधिकारी पिछले लगभग 18 माह से निलम्बित चल रहे हैं और इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि निलम्बित पदाधिकारी, नैतिकता के आधार पर पद त्यागने के स्थान पर, संगठन के पदों से चिपके हुये हैं। परिणामतः वे बहाल होने के लिये खुद ही अपनी पैरवी कर, अपने सदस्यों के स्वाभिमान को लगातार ठेस पहुंचा रहे हैं। परिणामतः संगठन विहीन कार्मिक या तो निवेश के आधार पर मलाई काट रहे है अथवा रात-दिन कार्य करने के बावजूद प्रताणित हो रहे हैं।

स्पष्ट है कि जब कार्मिक संगठनों के पदाधिकारी ही स्वयं अपने बचाव में लगे हों, तो वे किस प्रकार से सदस्यों की मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि अब ऊर्जा निगमों में योग्यता की परिभाषा कार्य नहीं, बल्कि चापलूसी, दलाली एवं निवेश बन चुकी है। कार्मिक संगठनों का शून्य की ओर जाना, इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि उनके वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने मुकाबले कभी किसी को भी आगे आने ही नहीं दिया और न ही किसी को आगे आने के लिए तैयार किया। इन संगठनों पर मौजूद पदाधिकारी, (Dummy) दिखावे के पदाधिकारी हैं, जिन पर 10 वर्षों से भी अधिक समय से सेवा निवृत्त पदाधिकारी नियन्त्रण बनाये हुये हैं। सेवा निवृत्त पदाधिकारियों के लिये वर्तमान पदाधिकारी मात्र शतरंज के मोहरे हैं। जिनको कतिपय बुड्ढे कार्मिक पदाधिकारी पिटवा पिटवा कर तालियां पीट रहे हैं। स्पष्ट है कि जिन संगठनों के शीर्ष पदाधिकारी ही निलम्बित हों, तो उनके सदस्यों का भविष्य क्या होगा। जबकि निलम्बित पदाधिकारियों को नैतिकता के आधार पर तत्काल संगठन के पदों से त्यागपत्र देकर, नये पदाधिकारियों के माध्यम से, अपनी बहाली के लिये प्रयास किये जाने चाहिये थे। कार्मिक संगठनों के शीर्ष पदों पर निलम्बित पदाधिकारियों का होना, सदस्यों एवं ऊर्जा निगमों के हितों एवं छवि के प्रतिकूल है। जिसका जीता जागता प्रमाण है, अपने ही घर में 30 वर्ष के अनुभव पर, बाहरी अभियन्ताओं का मात्र 15 वर्ष का अनुभव भारी है।

वास्तविकता एवं आश्चर्यजनक है कि अपने ही विभाग में 29 वर्ष के अनुभव के बावजूद, रिक्त निदेशक पदों के लिये अयोग्य हैं, जोकि कार्मिक संगठनों के पतन एवं प्रबन्धन के एक छत्र राज का जीता जागता प्रमाण है। हिन्दुस्तान में शायद ही ऐसा कोई विभाग होगा, जहां घर वालों की स्थिति ”घर की मुर्गी दाल बराबर“ भी नहीं है। आज टंगे हुये कौओं को देखकर लोगों ने अपना मुंह इस कदर सिल लिया है, कि खुद की आवाज, खुद के ही कानों तक नहीं पहुंच सके। वहीं आज पदोन्नत्ति के लिये आवश्यक अंकों की बाजीगरी में ईमानदारी हुई शो-केश में कैद। पदोन्नत्ति की सूची में अपना नाम तलाशते लोग। राष्ट्रहित में समर्पित! जय हिन्द!

बी0के0 शर्मा, महासचिव PPEWA.

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