200 यूनिट खपत, 700 यूनिट का बिल! मनमानी बिलिंग से त्रस्त उपभोक्ता, निगम ने झाड़ा पल्ला—बिलिंग एजेंसी पर डाली जिम्मेदारी

बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर इन दिनों सीधा हमला हो रहा है। जिले भर में मनमाने और बढ़े-चढ़े बिजली बिलों से उपभोक्ता परेशान हैं, लेकिन राहत के नाम पर सिर्फ टालमटोल मिल रही है। उपकेंद्रों और खंड कार्यालयों पर रोजाना शिकायतों का अंबार लग रहा है, फिर भी न अफसर सुनने को तैयार हैं, न कर्मचारी जिम्मेदारी लेने को।

हालात यह हैं कि 200 यूनिट की वास्तविक खपत वाले उपभोक्ताओं को 700 यूनिट या उससे ज्यादा का बिल थमाया जा रहा है, और जब उपभोक्ता सवाल करता है तो जवाब मिलता है—“यह हमारी नहीं, बिलिंग कंपनी की गलती है।”

बिना रीडिंग, अनुमान से बिल!

बिजली निगम ने बिलिंग का जिम्मा इनवेंटिव नामक निजी कंपनी को सौंप रखा है। यही कंपनी शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक मीटर रीडिंग, बिल जनरेशन और बिल वसूली का काम कर रही है। आरोप है कि कंपनी के कर्मचारी घरों पर जाए बिना ही अनुमान से यूनिट भरकर बिल बना रहे हैं, जिसका खामियाजा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है।

सारनाथ निवासी राकेश इसका उदाहरण हैं। हर महीने करीब 200 यूनिट खपत, लेकिन इस बार 700 यूनिट का बिल थमा दिया गया। ऐसे मामले अब अपवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा की हकीकत बन चुके हैं।

“एजेंसी जिम्मेदार है”—निगम की सुविधाजनक सफाई

उपभोक्ता जब संशोधन के लिए कार्यालय पहुंचते हैं तो निगम कर्मचारी साफ कह देते हैं—

“बिलिंग एजेंसी जिम्मेदार है, हम कुछ नहीं कर सकते।”

सवाल यह है कि अगर निजी कंपनी गलती कर रही है तो जवाबदेही किसकी है—एजेंसी की या सरकारी निगम की?
उपभोक्ता से पूरा बिल वसूला जाता है, लेकिन गलती पर जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं।

62 उपकेंद्रों पर नए ऑपरेटर, फिर भी गड़बड़ी

इनवेंटिव कंपनी ने जिले के 62 उपकेंद्रों पर नए कंप्यूटर ऑपरेटर तैनात किए हैं—

  • शहरी वितरण मंडल प्रथम: 30
  • शहरी वितरण मंडल द्वितीय: 30
  • ग्रामीण मंडल: 2

प्रत्येक ऑपरेटर को ₹17,109 मासिक वेतन, जिसमें से 5% कमीशन कंपनी को जाएगा। इतनी व्यवस्था के बावजूद अगर रीडिंग ही नहीं हो रही, तो यह लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता है।

उपभोक्ताओं की आपबीती

राकेश सिंह, उगापुर उपकेंद्र क्षेत्र:

“आज तक कोई मीटर रीडिंग करने नहीं आया। हर महीने 700–800 रुपये का बिल आता था, इस बार 2,031 रुपये भेज दिया।”

सुनीता तिवारी, केसरीपुर:

“कनेक्शन ग्रामीण से शहरी हो गया, लेकिन रीडिंग आज भी नहीं होती। इस बार सीधे 9,400 रुपये का बिल भेज दिया गया। हम कहां जाएं?”

निगम का जवाब—प्रीपेड मीटर ही समाधान?

इस मामले पर मुख्य अभियंता राकेश कुमार का कहना है कि

“उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं। जिनका बिल ज्यादा आ रहा है, वे उपकेंद्र पर आवेदन करें, नियमानुसार संशोधन होगा।”

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब गलती सिस्टम की है, तो उपभोक्ता ही क्यों दफ्तर-दफ्तर भटके?
क्या हर गलत बिल के लिए आवेदन देना ही समाधान है?

सवाल कायम

  • बिना रीडिंग बिल बन रहा है, तो निगरानी कहां है?
  • निजी एजेंसी की गलती की कीमत उपभोक्ता क्यों चुकाए?
  • क्या निगम सिर्फ वसूली करेगा, जिम्मेदारी नहीं?

जब तक इन सवालों के ठोस जवाब नहीं मिलते, तब तक उपभोक्ताओं की परेशानी और बिजली बिलों की मनमानी—दोनों जारी रहेंगी।

  • UPPCL MEDIA

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