बेबाक रिपोर्ट – संविदा कर्मी ऊर्जा विभाग का अभिन्न अंग… जिनके बिना आज विद्युत वितरण की नहीं की जा सकती कल्पना

दो दिन से सभी समाचारों में मुख्य समाचार यह है कि 30 हजार मेगावाट से ज्यादा मांग के अनुरुप रिकार्ड विद्युत आपूर्ति करने वाला उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बनने पर, प्रदेश के समस्त उपभोक्ताओं एवं उर्जा परिवार को प्रदेश के उर्जा मन्त्री के द्वारा बधाई दी गई है।

उपरोक्त के सन्दर्भ में यह संज्ञानित कराना है कि आज सभी कार्यों की परिणति अन्ततः लाईन पर कार्य करने वाले (अन्तिम कर्मचारी) संविदाकर्मी के माध्यम से ही होती है। जोकि सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जिसके बिना आज विद्युत वितरण की कल्पना ही नहीं की जा सकती। क्योंकि आज स्थिति यह है कि यदि संविदाकर्मी काम पर न आये तो एक तार जोड़ने के लिय भी, विभाग के पास अपना एक लाईन कर्मचारी तक नहीं है।

इसी प्रकार उत्पादन और पारेषण की भी स्थिति है। यदि आज उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे ज्यादा मांग वाला राज्य बना है तो उसका सबसे पहला श्रेय लाईन एवं विद्युत उपकेन्द्रों पर कार्यरत् इन्हीं अभागे संविदाकर्मियों को जाता है। जोकि बिना किसी सुविधा के ”नारकीय“ जीवन जीते हुये भी, सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार के पालन पोषण के नाम पर, नित्य अपने प्राणों की आहुति देते हुये, पूरे प्रदेश को रोशन कर रहे हैं। जिनके हालात पर, पूरे प्रदेश में कोई भी तरस तक खाने को तैयार नहीं है। अभियन्ता अधिकारियों के पास विभागीय खर्चे पर अपनी पसन्द के वातानुकूलित वाहन हैं। परन्तु तार टूटने अथवा ब्रेकडाउन की सूचना पर चिलचिलाती धूप में बिना सुरक्षा उपकरणों एवं किसी वाहन सुविधा के, लगभग 8 से 10 हजार वेतन एवं मृत्यु के बाद मात्र 7.5 लाख के बदले (वी भी गारन्टी नहीं), तत्काल आदेशों का पालन सिर्फ लाईन संविदाकर्मी करते हैं। जिनके लिये इस बात तक की कोई गारण्टी नहीं है कि चिलिचिलाती धूप में वे जिस बन्द लाईन पर कार्य कर रहे हैं, वह चालू नहीं होगी और वे बन्द लाईन पर कार्य करते हुये भुटटे की तरह नहीं भुनेंगे।

क्या कभी किसी ने यह विश्लेषण किया है कि गुलामों की तरह 24 घण्टे कार्य करने वाले लाईन संविदाकर्मियों को उनकी जान से सीधे-सीधे खिलवाड़ के बदले क्या दिया जाता है? ये बेचारे अफसरों की अफसरी, नेताओं की नेतागिरी और जनता की गाली-गलौच एवं लात-घूंसों के ही साये में जीने के आदी हो चुके हैं। कहने के लिये तो प्रदेश में लेबर इन्सपेक्टर की नियुक्ति है। परन्तु आजतक उससे किसी ने यह नहीं पूछा कि उर्जा निगमों में कार्यरत् रिकार्ड संविदाकर्मी किन-किन परिस्थितियों में और किन-किन सुविधाओं के साथ, रात-दिन लगातार कैसे कार्य करते हैं? क्या सिर्फ कागजों में ही नियमों की खानापूर्ति हो रही है।

यक्ष प्रश्न उठता है कि जब कोई संविदाकर्मी कार्य के दौरान विभागीय गलती के कारण हृदयविदारक मौत का शिकार होता है, तो क्या विभाग एवं अन्य ने भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिये, जांच कर यह सुनिश्चित करने का कभी कोई प्रयास किया है, कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृति न हो? जानकारी के अनुसार विभाग के पास न तो ऐसी कोई जांच और न ही आंकड़े हैं। यदि संविदाकर्मियों के कार्य, कार्य की अवधि एवं दी जाने वाली सुविधा के साथ-साथ दिये जाने वाले वेतन का अनुपातिक विश्लेषण किया जाये तो ज्ञात होता है कि बिना वेतन दिये ही, गुलामों की तरह उनसे कार्य लिया जाता है।

स्पष्ट है कि देश को आजाद हुये 77 साल अवश्य हो गये, परन्तु आज भी दैनिक मजदूरों का शोषण बदस्तूर जारी है। अतः यह कहकर अपने आपको स्वयं गौरान्वित महसूस करना की हमने देश में रिकार्ड विद्युत मांग को पूरा किया है, अपूर्ण सत्य है। क्योंकि हमने इस रिकार्ड को बनाने हेतु, अपने बहुत सारे लाईन संविदाकर्मियों के प्राणों की आहुतियां, प्रणाली में कमियों को दूर न करने के कारण दी हैं।

अतः निर्दोष प्राणों की बलि के आधार पर बनाया गया कोई भी रिकार्ड, कभी किसी सभ्य समाज को गौरान्वित नहीं कर सकता। क्योंकि यह रिकार्ड संविदाकर्मियों के शोषण एवं खून से रंगा हुआ है तथा इनकी छींटे आये दिन सोशल मीडिया पर दिखाई देती हैं। जिन्हें देखकर, प्रायः विभागीय, प्रशासनिक अधिकारी एवं नेतागण तक विचलित नहीं होते। सबसे अमानवीय एवं दुखद पहलू यह है कि हमारी आंकाक्षाओं एवं अपेक्षाओं पर अपने प्राणों की आहुति देने वालों को आजतक उचित श्रद्वा-सुमन एवं श्रद्वांजलि तक प्राप्त नहीं हुई।

यदि उपरोक्त रिकार्ड मांग की बात करें तो, यदि वास्तव में लाईनों के ब्रेकडाउन रुक जायें तो असीमित मांग के दबाव में ग्रिड बचाने के लिये, घड़ी-घड़ी की जाने वाली रोस्टिंग के कारण स्थिति भयावह हो सकती है। भला हो उन काबिल अभियन्ता अधिकारियों का जो इन्जीनियर कम सामग्री निर्माता/आपूर्तीकर्ताओं एवं ठेकेदारों के एजेन्ट ज्यादा हैं, जिनके लिये गुणवत्ताहीन सामग्री आयात करना एवं गुणवत्ताहीन कार्यों को गुणवत्तापरक करार देना ही, उनकी प्राथमिकता होती है। जिनके कारण थोड़े से ही दबाव पर ब्रेकडाउन हो जाते हैं, परिवर्तक धू-धू करके जल उठते हैं और हमें रोस्टिंग करने के स्थान पर, यह कहने का मौका मिल जाता है कि बिजली की कहीं कोई कमी नहीं है। अन्यथा आज की तारीख में वास्तविक मांग को पूरा कर पाना असम्भव है।

वितरण निगमों में एक तरफ लाईन पर कार्य करने वाले संविदाकर्मी हैं जिनकी जान का पता नहीं कब चली जाये। वहीं दूसरी ओर मीटर रीडर एवं अन्य कार्यो के लिये नियुक्त संविदाकर्मी, अपने रहन-सहन एवं वाहन से ही बाबू जी नजर आते हैं तथा इनकी जान को कोई जोखिम नहीं होता। वहीं विभागीय कार्मिकों को अच्छे वेतन के साथ-साथ नित्य पदोन्नति पर पदोन्नति और मलाईदार कुर्सी चाहिये। आज ऐसे-ऐसे लोग उच्चाधिकारी बन गये हैं, जिन्हें ये तक नहीं पता कि प्लास कैसे पकड़ा जाता है और लाईन पर कार्य करने के लिये आवश्यक सुरक्षा उपकरण एवं सुरक्षा व्यवस्था क्या होनी चाहिये। एक तरफ लोग कार्य की अधिकता का दुखड़ा रोते हैं। वहीं मुख्यालयों पर बहुत सारे अधिकारी सम्बद्ध हैं, परन्तु उनमें से कुछ के ही पास कई मलाईदार पदों के साथ-साथ, अन्य उच्च पद का भी अतिरिक्त कार्यभार है। जिसके पीछे उनकी एकमात्र योग्यता है, उच्चाधिकारियों के हितों की, बिना विचारे, सिरे से पूर्ति करना।

वैसे भी उर्जा निगमों में बहुत सारी कहानियां प्रचलित हैं जिसमें अधिकारी मात्र मनचाही नियुक्ति प्राप्त करने के लिये, ऐसा सब कुछ करता है, जिसे लिख पाना सम्भव नहीं है। जो यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि निहित स्वार्थ के बिना कोई भी कार्य उन पर बहुत बड़ा भार है। अन्ततः यह जानना रोचक होगा कि रिकार्ड मांग की पूर्ति करने के लिये, उर्जा निगमों के द्वारा कितने संविदाकर्मियों के प्राणों की बलि दी गई, उनके बलिदान के बदले उन्हें क्या दिया गया, भविष्य में विभाग लाईन संविदाकर्मियों के प्राणों की आहुति देना कब बन्द करेगा और विभाग में रात-दिन मेहनत करने वाले संविदा कर्मियों का क्या भविष्य है?

जय हिन्द!

बेवाक रिपोर्ट – बी0के0 शर्मा महासचिव PPEWA.

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