लखनऊ। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन में कर्मचारियों पर कार्रवाई को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के अधिकारियों द्वारा जारी दंडात्मक आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना तथ्यों और सही जांच के कर्मचारियों पर रिकवरी और सजा थोपना मनमाना रवैया है।
मामला कर्मचारी सतीश चंद्र से जुड़ा था, जिन पर 34,434 रुपये की रिकवरी और “सेन्सर एंट्री” की सजा दी गई थी। आरोप था कि ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त होने में लापरवाही हुई। लेकिन कोर्ट में पेश रिपोर्ट ने पूरी कहानी बदल दी।
जांच में खुली विभागीय कार्रवाई की पोल
एक्जीक्यूटिव इंजीनियर की रिपोर्ट में साफ बताया गया कि:
- तेज आंधी और तूफान के कारण LT लाइन पर पेड़ गिर गए थे।
- उसी वजह से ट्रांसफार्मर और लाइनें क्षतिग्रस्त हुईं।
- कहीं भी ओवरलोड की स्थिति नहीं मिली।
- ट्रांसफार्मर पर अनुमन्य सीमा के भीतर ही लोड था।
इसके बावजूद अधिकारियों ने कर्मचारी पर रिकवरी और दंडात्मक कार्रवाई कर दी।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि:
- आदेश “मैकेनिकल तरीके” से पास किया गया।
- विभाग ने इंजीनियर की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया।
- सही दिशा-निर्देशों का पालन नहीं हुआ।
कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 और 6 मार्च 2026 के आदेशों को निरस्त करते हुए MD, मध्यांचल विद्युत वितरण निगम को तीन सप्ताह में नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है।
कर्मचारियों में चर्चा तेज
इस फैसले के बाद बिजली विभाग के कर्मचारियों में चर्चा तेज हो गई है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि बिना निष्पक्ष जांच के फील्ड कर्मचारियों पर कार्रवाई करना अब अधिकारियों को भारी पड़ सकता है।
बड़ा सवाल
जब विभागीय जांच में तूफान और प्राकृतिक कारण जिम्मेदार पाए गए, तो फिर कर्मचारी पर रिकवरी और सजा क्यों थोपी गई? क्या निचले कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा था?
UPPCL में इस फैसले को कर्मचारियों की बड़ी जीत और अफसरशाही पर अदालत की कड़ी फटकार माना जा रहा है।








