FIR, तहरीर और विभागीय नियमों से खुली पोल
अमर उजाला की रिपोर्टिंग पर उठे गंभीर सवाल, पूर्व अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में
सूत्रों की माने तो जांच टीम अभी तक यह साबित नहीं कर पा रही है शिफ्ट हुआ था कि नहीं और 10 पोल कहां-कहां लगे हैं यह भी कोई बताने को तैयार नहीं है
लखनऊ। चिनहट क्षेत्र की पॉम वैली साइट को लेकर प्रकाशित खबर अब खुद सवालों के घेरे में है। उपलब्ध दस्तावेज—FIR, तहरीर और विभागीय तथ्य—स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि जिस कार्य को “भ्रष्टाचार” और “लाइन घोटाला” बताकर प्रचारित किया गया, वह वास्तव में वर्ष 2024 में स्वीकृत 554 किलोवाट लोड आवंटन के तहत किया गया कार्य था।
इसके बावजूद, हाल ही में मात्र एक माह पूर्व कार्यभार संभालने वाले अवर अभियंता वरुण पटेल को केंद्र में रखकर पूरी कहानी गढ़ दी गई।
📌 दस्तावेज क्या कहते हैं?
- FIR संख्या 0922 (02/05/2026) में भारतीय विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 136 में केस दर्ज
- घटना दिनांक: 29/04/2026, समय 5:30 बजे
- मौके पर कोई वैध दस्तावेज न मिलने पर नाम के आधार पर तहरीर दर्ज
- तहरीर में स्पष्ट—कार्य स्थल पर मौजूद लोग दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके
👉 यानी, कार्रवाई पूरी तरह प्रक्रियानुसार की गई, न कि किसी को बचाने या फंसाने के उद्देश्य से।
📌 सबसे बड़ा तथ्य जो छिपाया गया
✔️ लोड आवंटन 2024 में हुआ था
✔️ लगभग 60 पोल की लाइन पहले से स्वीकृत थी
✔️ 15% सुपरविजन मॉडल लागू था
👉 इस मॉडल में JE की भूमिका कार्य पूर्ण होने के बाद सत्यापन तक सीमित होती है, न कि हर समय निगरानी करना।
📌 फिर JE वरुण पटेल कैसे दोषी? यही सबसे बड़ा सवाल है?
- जब कार्य 2024 में स्वीकृत हुआ
- जब ठेकेदार और कार्य प्रणाली उपभोक्ता द्वारा तय
- जब मौके पर कोई दस्तावेज नहीं मिला
👉 तो फिर एक महीने पहले आए JE को आरोपी बनाने का आधार क्या है?
📌 मौके की सच्चाई बनाम मीडिया नैरेटिव
निरीक्षण के दौरान:
- 3–4 पोल पर एबीसी लाइन लगती मिली
- मजदूरों ने अमर अग्रवाल (प्रॉपर्टी डीलर) का नाम लिया
- कोई कागजी प्रमाण नहीं मिला
👉 ऐसे में विभागीय नियम साफ कहते हैं—
“जो नाम मौके पर सामने आए, उसी के आधार पर तहरीर दर्ज होगी”
यही प्रक्रिया पूरे प्रदेश में बिजली चोरी/कटिया मामलों में अपनाई जाती है।
📌 मीडिया की ‘जांच’ पर सवाल
प्रकाशित खबर में कुछ बिंदु उठाए गए, लेकिन:
- ❌ 2024 के लोड आवंटन का जिक्र नहीं
- ❌ 15% सुपरविजन नियम की जानकारी नहीं
- ❌ मौके पर दस्तावेज न मिलने की स्थिति का उल्लेख नहीं
👉 सवाल यह है—क्या यह अधूरी जानकारी पर आधारित रिपोर्टिंग है या जानबूझकर नैरेटिव सेट किया गया?
📌 साजिश की बू क्यों?
सूत्रों के अनुसार:
- क्षेत्र में पहले भी लाइन शिफ्टिंग और अनियमितताओं के मामले रहे
- नए JE की तैनाती के बाद
- लाइन ट्रिपिंग के कारण सामने आए
- फीडर ब्रेकडाउन उजागर हुए
- 49 किलोवाट बिजली चोरी पकड़ी गई
👉 ऐसे में यह आशंका मजबूत हो रही है कि पुराने खेल को छुपाने के लिए नए अधिकारी को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
📌 वरुण पटेल का स्पष्ट बयान
> “निरीक्षण के दौरान जो तथ्य सामने आए, उसी आधार पर कार्रवाई की गई। उस समय कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं था। बाद में लोड आवंटन की जानकारी सामने आई।”
📌 असली जिम्मेदार कौन?
अब जांच का फोकस होना चाहिए:
- 2024 में स्वीकृति देने वाले अधिकारी
- कार्य कराने वाले वास्तविक ठेकेदार/संबंधित लोग
- संविदा कर्मियों और पूर्व JE की भूमिका
📌 UPPCL MEDIA का मानना है कि यह मामला स्पष्ट रूप से:
- तथ्यों को दबाकर बनाई गई भ्रामक खबर
- नए अधिकारी को फंसाने का प्रयास
- पुरानी अनियमितताओं को छुपाने की रणनीति
अगर निष्पक्ष जांच हुई तो सच्चाई सामने आएगी—
और असली दोषी वही होंगे, जिन्होंने 2024 से अब तक इस खेल को चलाया।








