लखनऊ/इटौंजा।
इटौंजा के लुशैली गांव में स्मार्ट मीटर लगाने पहुंचे कर्मचारियों के साथ हुई मारपीट और बंधक बनाए जाने की घटना ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी है। समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के अनुसार ग्रामीणों ने 4000 रुपये तक मांगने का आरोप लगाते हुए टीम को बंधक बना लिया, पुलिस ने 11 लोगों को हिरासत में लिया और कंपनी को एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है — और वही सबसे ज्यादा अनदेखा किया जा रहा है।
आरोप 1000 से 4000 तक — सच कौन सा?
घटना के बाद अलग-अलग पत्रकारों द्वारा चलाई गई खबरों में आरोपों की राशि 1000 रुपये से लेकर 4000 रुपये तक बताई गई। सवाल यह है कि यदि किसी कर्मचारी द्वारा अवैध वसूली की जा रही थी तो क्या वह एक ही काम के लिए अलग-अलग व्यक्तियों से अलग-अलग राशि मांगता? क्या किसी ग्रामीण ने 1000 रुपये देने का प्रमाण प्रस्तुत किया? क्या किसी ने रिकॉर्डिंग, ट्रांजैक्शन, लिखित शिकायत या कोई साक्ष्य दिया?
यदि नहीं — तो केवल आरोप के आधार पर कर्मचारियों को दोषी ठहराना क्या न्यायसंगत है?
यदि सम्बन्धित पत्रकार इनसे पूछे लेता कि क्या इन्होंने ₹1000 दिया है, या फिर ₹1000 मांगने का कोई सबूत है कि सिर्फ ऐसे ही बोल रहे हैं कि 1000 मांग रहे थे… मांगने का भी सबूत लेकर प्रस्तुत करें… खुद अंदाजा लगाइए कि दोनों का बयान कितना अंतर है एक ही काम के लिए कोई पैसा मांगेगा सभी से एक फ़िक्स राशि मांगेगा कि अलग-अलग राशि मांगेगा…



पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है — दोनों पक्षों को शामिल कर सत्यापित तथ्यों के आधार पर रिपोर्टिंग। किंतु इस प्रकरण में अधिकांश खबरें एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहीं। घटना एक थी, लेकिन संस्करण कई बन गए। यह चिंतन का विषय है।
असली जड़: समन्वय की विफलता
उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर लगाने का कार्य उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन द्वारा निजी कंपनी इंटेली स्मार्ट को दिया गया है। अनुबंध के अनुसार कंपनी प्रति सिंगल फेज मीटर लगभग 150 रुपये तथा थ्री फेज पर लगभग 220-230 रुपये का भुगतान करती है। अनुमानतः फील्ड में कार्य कर रहे व्यक्तियों को सिंगल फेज पर लगभग 100 रुपये और थ्री फेज पर 150 रुपये तक मिलता है।
अब गणित देखिए —
यदि एक व्यक्ति दिन में अधिकतम 20 मीटर लगाता है और समूह में 5–10 लोग काम करते हैं, तो औसतन किसी एक को दिन का लगभग 200 रुपये मिलते हैं।
200 × 30 = 6000 रुपये प्रतिमाह।
क्या 6000 रुपये में कोई व्यक्ति अपने परिवार सहित जीवनयापन कर सकता है? परिवहन, भोजन, जोखिम, ग्रामीण विरोध — सब कुछ झेलकर?
यह स्थिति शोषण और अव्यवस्था की ओर संकेत करती है। कम भुगतान, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ और विभागीय सहयोग का अभाव — ये सब मिलकर टकराव की जमीन तैयार करते हैं।
विभागीय दूरी ने बढ़ाया अविश्वास
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जब उपभोक्ता स्थानीय विद्युत कार्यालय में पूछताछ करते हैं तो उन्हें अक्सर जवाब मिलता है — “हमें जानकारी नहीं, यह हमारे कर्मचारी नहीं हैं।”
यही वाक्य ग्रामीण क्षेत्रों में संदेह और विरोध को जन्म देता है।
जब विभाग स्वयं स्पष्ट रूप से यह नहीं बताता कि मीटर बदलने का अभियान किसके माध्यम से चल रहा है, तो अफवाहें फैलती हैं — और फिर कोई भी समूह आरोप लगाकर माहौल भड़का देता है।
प्रीपेड विवाद: विरोध की असली वजह
ग्रामीण क्षेत्रों में स्मार्ट मीटर का सबसे बड़ा विरोध इस बात को लेकर है कि पोस्टपेड मीटर को बिना लिखित सहमति के प्रीपेड मोड में बदला जा रहा है।
विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 47(5) और धारा 55(1) उपभोक्ता हितों की रक्षा की बात करती हैं। यदि उपभोक्ता की सहमति के बिना प्रीपेड प्रणाली लागू की जाती है, तो यह अधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में आएगा।
यही कारण है कि लोगों में असंतोष है — और इसी असंतोष की आड़ में आरोपों का वातावरण बन जाता है।
इटौंजा की घटना: जिम्मेदारी किसकी?
इटौंजा में जो हुआ वह निंदनीय है। किसी भी कर्मचारी को बंधक बनाना कानूनन अपराध है। लेकिन यह भी सच है कि यदि विभागीय स्तर पर समन्वय, पारदर्शिता और स्थानीय सूचना व्यवस्था मजबूत होती, तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही न होती।
स्थानीय विद्युत विभाग की भूमिका पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। क्या अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता, अवर अभियंता और ग्राम प्रधान को पूर्व सूचना दी गई थी? क्या स्थानीय थाना को अवगत कराया गया था? यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही है।
आगे के लिए आवश्यक कदम
- प्रत्येक कर्मचारी गले में कंपनी का वैध परिचय पत्र प्रदर्शित करे।
- संबंधित क्षेत्रीय अधिकारियों, ग्राम प्रधान एवं थाना को पूर्व सूचना दी जाए।
- ग्राम प्रधान व प्रभावशाली व्यक्तियों की उपस्थिति में ही घर के अंदर प्रवेश किया जाए।
- प्रीपेड परिवर्तन केवल लिखित सहमति से हो।
करारा सवाल पावर कॉरपोरेशन से
👉 यदि स्मार्ट मीटर अभियान जनहित में है तो पारदर्शिता से क्यों नहीं चलाया जा रहा?
👉 यदि वसूली के आरोप झूठे हैं तो प्रमाण सहित स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया जाता?
👉 यदि कर्मचारी कंपनी के हैं तो विभाग खुलकर उनके साथ क्यों नहीं खड़ा होता?
इटौंजा की घटना केवल एक गांव की कहानी नहीं है — यह उस अव्यवस्थित व्यवस्था का परिणाम है जहां नीति ऊपर बनती है, जिम्मेदारी नीचे टाली जाती है और बीच में पिसता है कर्मचारी तथा उपभोक्ता।
अब समय है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन स्पष्ट नीति, कानूनी अनुपालन और जमीनी समन्वय के साथ आगे आए — अन्यथा ऐसे टकराव आगे भी होते रहेंगे।







