सेवा प्रदाता की आड़ में कर्मचारियों का शोषण नहीं चलेगा
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने यूपीपीसीएल और मध्यांचल विद्युत वितरण निगम को बड़ा झटका देते हुए साफ संकेत दे दिए हैं कि वर्षों से काम कर रहे संविदा कर्मचारियों को सिर्फ “सर्विस प्रोवाइडर” का कर्मचारी बताकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
विशेष अपील संख्या 226/2026 में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने विभाग की दलीलों पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने माना कि कर्मचारियों की नियुक्ति भले सेवा प्रदाता के माध्यम से दिखाई गई हो, लेकिन उनके सेवा संबंधी निर्णय सीधे निगम द्वारा लिए जा रहे थे। यहां तक कि कर्मचारियों को हटाने की कार्रवाई भी निगम स्तर से की गई।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि कर्मचारियों को बिजली बिल वसूली का कार्य सौंपा गया था। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं किया गया जिससे विभाग का दावा सही साबित हो सके। कर्मचारियों का कहना था कि वे लाइनमैन-कम-हेल्पर के रूप में बिजली व्यवस्था के रखरखाव का कार्य कर रहे थे।
खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि प्रथम दृष्टया कर्मचारी निगम के नियमित कर्मचारी नहीं माने जा सकते, लेकिन जिस तरीके से उन्हें हटाया गया, उसकी वैधानिकता और प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। कोर्ट ने विभाग को अतिरिक्त शपथपत्र दाखिल करने की छूट देते हुए मामले को पुनः रिट कोर्ट में सुनवाई के लिए भेज दिया।
सबसे अहम बात यह रही कि हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश को फिलहाल प्रभावी बनाए रखा। यानी कर्मचारियों को राहत जारी रहेगी और विभाग की जल्दबाजी पर रोक बनी रहेगी।
विभागीय गलियारों में चर्चा तेज
इस आदेश के बाद बिजली विभाग और निगम प्रबंधन में खलबली मच गई है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह फैसला उन हजारों संविदा कर्मियों के संघर्ष को मजबूती देगा जिन्हें वर्षों तक स्थायी कार्य लेकर भी अस्थायी व्यवस्था में रखा गया।








