बेबाक : क्या निजीकरण वाला जिन्न, उपभोक्ता देवो भव: (विकास) की आड़ में जनता के धन के सुनियोजित बन्दरबाट का एक बहाना तो नहीं है… (Part-1) 

मित्रों नमस्कार! स्वास्थ के कारण पिछले काफी समय से बेबाक का कोई भी अंक पोस्ट नहीं हो पाया। पिछले कुछ वर्षों से ऊर्जा निगमों में वीडिओ कान्फ्रेन्सिंग एवं ERP के माध्यम से विभाग को चलाने और बात-बात पर दण्ड देने का दौर चरम पर चल रहा है। परन्तु विभाग लगातार, अविरत् 5 से 6 हजार करोड़ रुपये (लगभग) प्रतिवर्ष की दर से घाटे में डूबते हुये, चुपचाप एक लाख करोड़ के घाटे को भी पार कर चुका है। जिस पर कभी भी न तो सरकार ने और न ही कार्मिक संगठनों ने ही कोई गम्भीरता दिखलाई। अब अचानक सरकार एवं प्रबन्धन द्वारा, विभाग के बढ़़ते घाटे एवं उसके समाधान के नाम पर, एक बार फिर निजीकरण का जिन्न छोड़ दिया गया है। वैसे तो ऊर्जा निगमों के निजीकरण की कार्य योजना पर सरकार बहुत दिनों से कार्य कर रही है। परन्तु खरीददार (कसाई) द्वारा भैंस के अस्वस्थ होने के नाम पर, खरीदने से इन्कार किया जाता रहा है तथा कसाई की ही शर्तों के मुताबिक, हजारों करोड़़ की सुदृढ़िकरण की विभिन्न योजनाओं (DDUGJY-10, 11, 12, New, Saubhagya, ADB, RDSS, etc.) के माध्यम से, भैंस को स्वस्थ रखने के नाम पर जनता के धन की गुणवत्ताहीन कार्य/सामग्री के माध्यम से बन्दरबाट की जाती रही है। जिसके लिये ही सम्भावित खरीददारों के हितों के अनुसार ही, कई-कई जिलों के Cluster बनाकर, बड़ी-बड़ी निविदायें आमन्त्रित की जाती रही हैं। जिसमें नियम एवं शर्तें कुछ इस प्रकार से रखी जाती हैं कि जिन्हें ऊर्जा निगमों के सम्भावित खरीददार ही पूरा कर सकते हैं।

पूर्वांचल को तीन भागों में बांटने अर्थात अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति तथा एक बार फिर प्रस्तावित तीन कम्पनियों के सुदृढ़िकरण के नाम पर सरकारी धन का बन्दरबाट करने के अतिरिक्त कुछ भी प्रतीत नहीं होता है। विदित हो कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका 79/1997 पर यह स्पष्ट रुप से माना गया था कि ऊर्जा निगमों के घाटे का मूल कारण राजनीतिक हस्तक्षेप है। तो तत्कालीन उ०प्र०रा०वि०प० के मात्र 70 करोड़ के घाटे को दूर करने के लिये विघटन के उपरान्त पंजीकृत कम्पनियों में नियुक्त निदेशक मण्डल में सरकार द्वारा MOA को दरकिनार करते हुए अपने विश्वस्त प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति करके, सभी ऊर्जा निगमों को अप्रत्यक्ष नहीं बल्कि प्रत्यक्ष रुप से सरकार ने अपने ही अधीन रखा हुआ है। जिसमें समय-समय पर सरकार द्वारा प्रशासनिक अधिकारी बदले जाते रहते हैं तथा वे आते ही राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु, अंग्रेजों के जेलर की तरह दहशत फैलाने हेतु, अपनी इच्छानुसार, सुधार के नाम पर, नियमित कार्मिकों को ताश के पत्तों की तरह फेंटते हुये अपने प्यादों को जगह-जगह नियुक्त करते हैं तथा अपनी राह में आने वालों को दूर-दराज फेंककर अथवा निलम्बित करके, अन्य के लिये उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इतिहास गवाह है कि किसी भी सभ्यता अथवा संगठन को बर्बाद करने के लिये सबसे महत्वपूर्ण है योग्यता को हतोत्साहित कर अयोग्यता को पदासीन करना।

कथित राजनीतिक एवं प्रशासनिक महत्वकांक्षा की पूर्ति हेतु ही ऊर्जा निगमों में खुली लूट के लिये ही, एक सोची समझी नीति के तहत, योग्यता को दण्डित करने और अयोग्यता को सम्मानित करने का खेल, कार्मिक संगठनों के कतिपय पदाधिकारियों के साथ मिलकर खेला जाता रहा है। तत्कालीन उ०प्र०रा०वि०प० के विघटन के उपरान्त कार्मिक संगठनों के द्वारा MOA के पालन हेतु, कहीं कोई काना-फूसी तक नहीं की गई, क्योंकि उन्हें प्रबन्ध निदेशक/निदेशक पद पर नियुक्ति के साथ-साथ अन्य उपहारों एवं मलाईदार पदों पर नियुक्ति का आश्वासन प्राप्त हुआ था। जो कार्मिक संगठनों की कार्यशैली एवं संलिप्तता को पूर्णतः स्पष्ट करती है।

ये उन्हीं उपहारों का परिणाम है कि उस वक्त विघटन के समय शहद पाने वाले पदाधिकारी आज भी सेवानिवृत्त होने के बाद भी निहित एवं प्रबन्धन के स्वार्थों की पूर्ति हेतु विभाग के साथ जुड़े हुये हैं। एक छोटा सा प्रश्न है कि क्या कोई बता सकता है कि ऊर्जा निगम किस क्षेत्र में आत्म निर्भर हैं? यदि एक तार भी जोड़ना हो तो, उसके लिये भी वाह्य कार्यदायी संस्था पर निर्भर होना पड़ता है और उससे भी बुरी स्थिति तो यह है कि जब एक गरीब संविदाकर्मी बन्द लाइन पर कार्य कर रहा होता है तो उसमें विद्युत प्रवाह आरम्भ हो जाता है और वह गरीब अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जिसके बाद उस गरीब के परिवार को कुछ लाख का मुआवजा देकर, विभाग अपने उत्तरदायित्वों के पालन करने का दिखावा करता है। बेबाक दावे से कह सकता है कि ऊर्जा निगमों में आये दिन किसी न किसी निरीह प्राणी की असमय हृदय विदारक मृत्यु, दुर्घटना न होकर हत्या के समान है। जिसके लिये पूरी की पूरी प्रणाली उत्तरदायी है।

आज कुछ कार्मिक संगठन एक बार फिर सम्भावित निजीकरण के नाम पर हो-हल्ला करते नजर आ रहे हैं। जोकि पूर्णतः प्रायोजित दिखलाई पड़ रहा है। क्योंकि लगभग दो वर्ष पूर्व, जब उनके कुकृत्यों का हिसाब खोला जा रहा था, तो बात-बात पर कार्य बहिष्कार, नियमानुसार कार्य एवं हड़़ताल करने के लिये वे अति आत्मविश्वास में सभ्य आचरण की मर्यादा तक को त्याग चुके थे। जिस पर यह चर्चा आम थी कि वह आन्दोलन, बड़े़-बड़े घोटालों के आरोपियों को बचाने हेतु, कतिपय लोगों के द्वारा प्रायोजित किया गया था तथा उद्देश्य/लक्ष्य की प्राप्ति के बाद, प्रायोजकों के द्वारा अपने हितों के मद्देनजर, अपने हाथ खींच लेने से, कतिपय निलम्बित पदाधिकारी, पिछले लगभग दो वर्षों से पिजड़ें में कैद होकर उनके रहमो-करम पर निर्जीव से पड़े थे। जिनके द्वारा न तो नैतिकता के आधार पर अपने संगठन के पदों से त्यागपत्र दिया गया और न ही उनकी बहाली के लिये कोई सांकेतिक आन्दोलन तक हुआ, बस चहुं ओर सन्नाटा था। जोकि घोटालों की मात्रा एवं तीव्रता का एक जीता जागता उदाहरण है। यक्ष प्रश्न उठता है कि क्या कार्मिक संगठनों के पदाधिकारी कुछ बाहरी लोगों के हाथों की कठपुतली के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं।

यह एक संयोग है या कोई षडयन्त्र, कि पिछले दो वर्षों से निलम्बित चल रहे कार्मिक पदाधिकारियों की अचानक बहाली के उपरान्त, अचानक ही निजीकरण का जिन्न बाहर आ गया और एक बार फिर से मरणासन्न संगठनों में चेतना उत्पन्न हो गई है। बेबाक का यह मानना है कि ऊर्जा निगमों के निजीकरण के जिन्न के पीछे एक सुनियोजित उद्देश्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। जिसमें तुम हल्ला करो और हम एक बार फिर मिल बैठकर बंदरबांट करेंगे। अर्थात निजीकरण की सम्भावना न के बराबर है। क्रमशः…..

राष्ट्रहित में समर्पित! जय हिन्द! बी0के0 शर्मा महासचिव PPEWA.

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