हाई कोर्ट का मध्यांचल डिस्कॉम पर करारा प्रहार — 25 संविदा कर्मियों की बहाली का आदेश, बर्खास्तगी पर उठे गंभीर सवालमाननीय हाई कोर्ट ने मनमानी और बिना जांच की कार्रवाई पर कड़ा प्रहार किया। 25 संविदा कर्मियों की बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए बहाली और बकाया वेतन का आदेश दिया। न्यायालय के इस फैसले से प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है।
लखनऊ। माननीय हाई कोर्ट ने मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (मध्यांचल डिस्कॉम) की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए प्रबंध निदेशिका रिया केजरीवाल द्वारा किए गए 25 संविदा कर्मियों के बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी प्रभावित कर्मियों को उनके मूल तैनाती स्थल एवं पद पर तत्काल प्रभाव से पुनः नियुक्त किया जाए, साथ ही बर्खास्तगी की तिथि से अब तक का संपूर्ण वेतन भी अदा किया जाए।
यह आदेश न केवल 25 परिवारों के लिए राहत बनकर आया है, बल्कि विभागीय निर्णय प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
क्या था पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, अमौसी जोन के मुख्य अभियंता द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर प्रबंध निदेशिका रिया केजरीवाल ने 25 संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। इतना ही नहीं, उन्हें ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया था।
बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई पूर्व के अधीक्षण अभियंता एवं अधिशासी अभियंता की संस्तुति पर आधारित थी, जिन्होंने “बिजली बिल राहत योजना 2025-26” में इन कर्मियों के कार्यों को लेकर नकारात्मक रिपोर्ट दी थी।
चौंकाने वाली बात यह है कि जिन अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर यह कठोर कार्रवाई हुई, वे स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे पाए गए और बाद में उन्हें निलंबित कर हटाया भी गया। इसके बावजूद मुख्य अभियंता, अमौसी जोन ने बिना स्वतंत्र जांच किए उन्हीं रिपोर्टों को सही मानते हुए अपनी संस्तुति प्रबंध निदेशिका को भेज दी।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
माननीय न्यायालय ने पूरे प्रकरण में प्रक्रिया की निष्पक्षता और जांच की पारदर्शिता पर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस और स्वतंत्र जांच के इस प्रकार की कठोर कार्रवाई न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
मीडिया और पैरवी की भूमिका
इस पूरे मामले को उजागर करने में “यूपीपीसीएल मीडिया” के संस्थापक पदाधिकारी एवं सुदर्शन न्यूज़ से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी रवि शर्मा की प्रमुख भूमिका रही, जिन्होंने इस मुद्दे को लगातार उठाया।
वहीं, पीड़ित कर्मियों की ओर से पैरवी करते हुए एडवोकेट निरंजन सिंह ने न्यायालय में प्रभावी ढंग से पक्ष रखा, जिसके परिणामस्वरूप यह महत्वपूर्ण फैसला सामने आया।
“यूपीपीसीएल मीडिया” का मानना है कि हाई कोर्ट का यह आदेश न केवल 25 संविदा कर्मियों के लिए न्याय की जीत है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि प्रशासनिक मनमानी और बिना जांच के लिए गए निर्णय न्यायालय की कसौटी पर टिक नहीं सकते।
जल्द ही इस आदेश की प्रति और विस्तृत कानूनी बिंदुओं के साथ पूरा विवरण यूपीपीसीएल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया जाएगा।
नोट: यह समाचार उपलब्ध सूचनाओं एवं संबंधित पक्षों के दावों पर आधारित है। अंतिम तथ्य न्यायालय के आधिकारिक आदेश एवं अभिलेखों के अधीन होंगे।








