बढ़ता भ्रष्टाचार हमारे जीवन के दोहरे चरित्र का प्रमाण है…

जहां हम अपने कार्य के बदले किसी भी प्रकार के सुविधा शुल्क की मांग पर आग-बूला हो जाते हैं तो वहीं दूसरे का कार्य बिना सुविधा-शुल्क प्राप्त किये, किसी भी सूरत में काम करना ही नहीं चाहते। जिसका एक स्वरुप हैः यदि कोई ईमानदार हो या अपने आपको ज्यादा ही स्मार्ट समझ रहा हो, अर्थात सुविधा-शुल्क न देने पर अमादा हो। तो मुंह में राम बगल में छूरी की कहावत के अनुसार, पहले उसका खेल बिगाड़ा जाता है फिर किसी तीसरे के माध्यम से उचित पारिश्रमिक प्राप्त कर, उसका खेल सुधारकर, एहसान जताते हुये अपने आपको एक धर्मात्मा के रुप में प्रस्तुत किया जाता है…

मित्रों नमस्कार! बेबाक निजीकरण का समर्थन नहीं करता। सोशल मीडिया पर एक सम्मानित वरिष्ठ नागरिक का लेख पढ़ा। जिसमें उनके द्वारा भ्रष्टाचार घटने की बजाये लगातार बढ़ने पर तमाम सवाल दागे गये थे। जिसका प्रत्युत्तर सिर्फ एक है, कि हम जीवन में दोहरे चरित्र के साथ जीते हैं। जब हमारा किसी से कोई काम पड़ता है, तो आदर्श एवं ईमानदारी की अपेक्षायें सर्वोपरि होती हैं, हम जीवन के आदर्श एवं मूल्यों पर लम्बे चौड़े भाषण देने लग जाते हैं। परन्तु जब हमारे पास, कोई किसी काम के लिये आता है, तो हमारी वाजिब-गैर वाजिब, हर तरह की अपेक्षायें, चरमोत्कर्ष पर होती हैं तथा वो आदर्श हमें समय की बर्बादी लगते हैं। अन्ततः हम कह ही उठते हैं, कि खामखाह पकाने आ जाते हैं।

भ्रष्टाचार पर प्रायः वे ही सबसे अग्रिम पंक्ति में आकर भाषण देते हैं, जो स्वयं भ्रष्टाचार के घ्वजा वाहक होते हैं। जिनका उद्देश्य, कदापि भ्रष्टाचार समाप्त कराना नहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य/स्वार्थ सिर्फ अपने मार्ग से भ्रष्टाचार की गंदगी को साफ करना मात्र होता है। जिसका जीता-जागता उदाहरण है हमारे बड़े-बड़े राजनेता, जो चुनाव के समय कुछ, तो चुनाव के बाद चुप। स्पष्ट है कि राजा हरिश्चन्द के मार्ग का अनुशरण तो छोड़िये, आज नाम लेने वाला तक, कहीं दूर-दूर तक दिखलाई नहीं देता है। समय के अनुसार भ्रष्टाचार का रुप बदल चुका है, जिसमें यह One to one न होकर, किसी न किसी तीसरे विश्वसनीय के माध्यम से होता है, अर्थात भ्रष्टाचार भी अब सेवा की श्रेणी में आ गया है। आज इनटरनेट पर तमाम ऐसी संस्थायें मिल जायेंगी, जो उचित भुगतान पर, आपका कार्य कराने की जिम्मेदारी लेती हैं। जिनका लाभ यह है, कि आपको कहीं भी धक्के-खाने की जरुरत नहीं, आपका असम्भव सा दिखने वाला कार्य, घर बैठे हो जाता है।

यदि ऊर्जा निगमों की बातें करें, तो घरेलू, वाणिज्य और औद्योगिक संयोजनों को घर बैठे दिलाने के लिये तमाम लोग/एजेन्सियां, उच्चाधिकारियों के संरक्षण में कार्यरत् हैं। ठेके के आधार पर कार्य कराने वाली ये एजेन्सियों कोई भी असम्भव कार्य को सुगमता पूर्वक कराने की विशेष योग्यता रखती हैं। जैसे कबाड़ सामग्री, को गुणवत्तायुक्त होने का प्रमाण पत्र दिलाना। गुणवत्ताहीन कार्य को अपेक्षित मानक युक्त घोषित कराना। इनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि भण्डार केन्द्र से सामान लेकर, बिना कोई कार्य हुये अर्थात मौके पर बिना एक कील तक लगे, काल्पनिक कार्य का पूर्ण भुगतान कराने, इससे भी आगे यदि कार्य समाप्त हो गया हो और साहब को अपेक्षित लाभ नहीं हुआ हो, तो कार्य पूर्ण कराने के नाम पर अतिरिक्त प्राक्लन स्वीकृत कराकर, भण्डार केन्द्र से प्राप्त सामग्री को ठिकाने लगवाकर, पूर्ण भुगतान कराने में इनके पास विशेष विशेषज्ञता है। मजेदार बात यह है कि इस प्रकार के कार्यों में सहयोग करने वाले अधिकारी एवं ठेकेदार ही प्रबन्धन की पहली पसन्द होते हैं। जहां तक जांच और दण्ड की बात है, तो विद्युत प्रशिक्षण संस्थान में अनुशासनात्मक कार्यवाही के कैप्सूल वितरीत करने वाले भी, आज अनियमितताओं के इन विशेषज्ञों के समक्ष, नतमस्तक हो चुके हैं। क्योंकि जिन गम्भीर अनियमितताओं पर जांच और दण्ड को समझाते-समझाते इन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की एवं जीवनभर की तपस्या से, जिनके ईलाज के लिये, इनके द्वारा जो भ्रष्टाचार विरोधी कैप्सूल ईजाद किये गये थे, वे सभी इन गम्भीर अनियमितताओं के समक्ष निष्क्रिय/प्रभावहीन ही नहीं हो गये, बल्कि सम्भवतः भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्ति प्राप्त करने में कहीं न कहीं सहायक सिद्ध हुये हैं। अर्थात इनकी भ्रष्टाचार विरोधी कैप्सूल रुपी मिसाईलें, भ्रष्टाचार के समक्ष दीपावली के पटाखे से ज्यादा कुछ भी साबित नहीं हुई।

आज हालात यह हैं कि अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के प्रसिद्ध कथावाचक, अब ज्ञान के कैप्सूलों को छोड़कर, फिल्मी गानों की लाईनें गा-गाकर, जिन्दगी के मोड़ पर राहें दिखलाने में लग गये हैं। कि ”तू न चलेगा तो चल देंगी राहें“। उनका दर्द सही है के ”तू न चलेगा“ अर्थात तू न लूटेगा, तो ”चल देंगी राहें“ अर्थात कोई और लूट ले जायेगा। वैसे सत्यता यह है कि अब चिलचिलाती धूप अथवा कड़कड़ाती ठंड में चलने की जरुरत नहीं है। सड़क हो या लाईन, जब बनी ही नहीं, तब आप चलेंगे ही कहां। चलनी है बस कलम, घर बैठे चलाईये। कहीं कोई दिक्कत आ जाये तो उपरोक्त कथित कैपसूल का प्रयोग कीजिये और शान से जीवन व्यतीत कीजिये।

आज का कटु सत्य यह है कि अब बाजार में सिर्फ नाम और दाम ही चलता है। बाकी ईमानदारी, मर्यादा, इन्सानियत, आदि सब प्राईमरी पाठशाला की पुस्तकों और उनकी परिक्षाओं तक में ही सिमट कर रह गये हैं। उनका दैनिक जीवन एवं अब जगह-जगह की जा रही नेताओं की सभाओं तक में कोई महत्व नहीं रह गया है। प्रायः जांच एवं पकड़-धकड़ आम-लोगों को न्याय एवं ईमानदारी के दिखावे की भूल-भूलैया में उलझाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उचित धन-बल के आधार पर सीट पर बैठने हेतु, नये-नये लाइसेंस धारक के लिये, जांच एवं धड़-पकड़ का मूल उद्देश्य, पुराने मूल्यों को संशोधित करने का, मात्र एक साधन होता है। जिसमें लाइसेंस फीस जमा होने के कारण उसके विरुद्ध उठी शिकायतें स्वतः अनसुनी हो जाती हैं। जिस प्रकार से फिल्मों में (जोकि प्रायः समाज का एक आईना होती हैं) यह दिखाया जाता है कि क्षेत्र में आने वाले नये अधिकारी को, किसकी कोठी पर जाकर पहले रिपोर्टिंग करनी होती है, ठीक उसी प्रकार से प्रायः नव नियुक्त अधिकारी को भी कहीं न कहीं रिपोर्टिंग करनी होती है। अन्यथा की स्थिति में उसके लिये वहां अंगारों पर चलने जैसी स्थिति हो जाती है।

क्योंकि प्रायः ऊपर से नीचे तक के सभी लोग, वहां पर, उक्त कोठी के रहमों-कर्म पर ही दुकान लगाये बैठे हैं। ऊर्जा निगमों में प्रायः बिगाड़ने और सुधारने का खेल बखूबी खेला जाता है। जिसमें यदि कोई ईमानदार या अपने आपको ज्यादा ही स्मार्ट समझ रहा हो, तो पहले उसका खेल बिगाड़ा जाता है, फिर किसी तीसरे के माध्यम से उचित पारिश्रमिक प्राप्त कर उसका खेल सुधारा जाता है और एहसान जताते हुये अपने आपको एक धर्मात्मा के रुप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां पर जैसे भगवान की कथा सुनाने वाले, जीवन के मूल्यों पर बड़ी-बड़ी बांते करने वाले कथा वाचक, अपने नाम के अनुसार, मोटी रकम लेकर, मोह-माया त्यागकर, सतमार्ग पर चलने की सलाह, अर्थात मोह-माया का डर दिखलाते हुये, माया समेटकर, अपनी मर्सडीज में विदा हो जाते हैं। कुछ इसी प्रकार से पहले खेल बिगाड़कर और फिर ईमानदारी का भूत उतरने तक चक्कर कटवाने के बाद, बिगड़े खेल को मेहनताना लेकर सुधारने वाले संत-महात्माओं की कोई कमी नहीं है। क्योंकि यहां ”तू न चलेगा तो चल देंगी राहें“। बस फिर राह तलाशते रहना। बकाये बिलों पर OTS के तहत छूट चल रही है, जायें, *कुछ देकर आयें और लाभ पायें।

राष्ट्रहित में समर्पित! जय हिन्द!

-बी0के0 शर्मा महासचिव PPEWA.

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