उत्तरप्रदेश सरकार के ऊर्जा विभाग ने पहले ही दावा किया था कि इस बार गर्मी में बिजली की मांग 34,000 मेगावाट तक पहुंच सकती है। तैयारी के दावे भी बड़े-बड़े किए गए — “निर्बाध बिजली”, “फुल प्लानिंग”, “कोई संकट नहीं”।
ऊर्जा मंत्री A. K. Sharma ने विधानसभा में भरोसा दिलाया —
👉 31,000 MW उत्पादन क्षमता
👉 बाकी जरूरत MoU के जरिए पूरी
लेकिन सवाल ये है — जब कागजों पर सब कुछ ठीक था, तो जमीनी हकीकत में अंधेरा क्यों है?
MoU मॉडल की सीमाएं
दूसरे राज्यों से बिजली खरीदने का दावा, लेकिन:
- पीक टाइम में दूसरे राज्यों में भी डिमांड हाई
- महंगी बिजली खरीद से वित्तीय दबाव
👉 नतीजा: “कागज पर समझौता, जमीन पर कटौती”
लखनऊ। उत्तरप्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बढ़ती बिजली कटौती ने सरकार और ऊर्जा विभाग के दावों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर ऊर्जा विभाग ने फरवरी महीने से ही यह दावा करना शुरू कर दिया था कि प्रदेश में गर्मी के मौसम में निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए व्यापक तैयारियां कर ली गई हैं, वहीं दूसरी ओर मौजूदा हालात यह बता रहे हैं कि राजधानी लखनऊ से लेकर गांव-कस्बों तक लोग घंटों बिजली संकट झेलने को मजबूर हैं।
🔥 असल संकट कहां है?
उत्पादन बनाम आपूर्ति का झूठा संतुलन
सरकार 31,000 MW उत्पादन की बात करती है, लेकिन
👉 वास्तविक उपलब्धता (Plant Load Factor, मेंटेनेंस, फ्यूल संकट)
👉 और पीक डिमांड के समय सप्लाई गैप
इन दोनों के बीच बड़ा अंतर है।
कागज पर क्षमता ≠ जमीन पर सप्लाई
ऊर्जा विभाग के अनुसार इस बार गर्मी में प्रदेश में बिजली की मांग 34 हजार मेगावाट से अधिक पहुंचने का अनुमान पहले से था। विधानसभा के बजट सत्र में प्रदेश के ऊर्जा मंत्री A. K. Sharma ने भी कहा था कि राज्य में लगभग 31 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता उपलब्ध है तथा अतिरिक्त जरूरत को अन्य राज्यों से किए गए एमओयू के माध्यम से पूरा किया जाएगा।
इसके बावजूद प्रदेश में लगातार बढ़ रही बिजली कटौती अब विभागीय तैयारियों की पोल खोलती नजर आ रही है। कई जिलों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय तक बिजली बाधित रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि उपभोक्ता बिजली कार्यालयों पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।
ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन की बदहाली
- जर्जर लाइनें
- ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर
- फाल्ट रिस्पॉन्स में देरी
👉 यही असली “ब्लैकआउट फैक्ट्री” है।
बिजली बन रही है, लेकिन पहुंच नहीं पा रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल बिजली उत्पादन की नहीं बल्कि ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की भी है। प्रदेश के कई इलाकों में जर्जर लाइनें, ओवरलोड ट्रांसफार्मर तथा फाल्ट सुधार में देरी आम समस्या बन चुकी है। बिजली उपलब्ध होने के बावजूद उपभोक्ताओं तक निर्बाध आपूर्ति नहीं पहुंच पा रही है।
रोस्टर सिस्टम – पुरानी सोच, नई परेशानी
देश के कई राज्यों ने रोस्टर खत्म कर दिया,
लेकिन यूपी में अभी भी
👉 “कटौती तय”
👉 “घंटे तय”
ग्रामीण इलाकों में आज भी 18–20 घंटे बिजली का दावा,
लेकिन हकीकत — 10–14 घंटे भी मुश्किल
वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी रोस्टर व्यवस्था लागू होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जब देश के कई राज्यों में रोस्टर आधारित कटौती समाप्त हो चुकी है, तब उत्तरप्रदेश में ग्रामीण उपभोक्ताओं को सीमित घंटे बिजली दिए जाने की व्यवस्था पर विपक्ष और उपभोक्ता संगठन लगातार सवाल उठा रहे हैं।
प्रश्न: जब सिस्टम इतना बड़ा है, तो भर्ती क्यों नहीं? 55 वर्ष से अधिक आयु के संविदाकर्मियों के साथ -साथ अन्य भारी संख्या में संविदाकर्मियों को क्यों हटाया गया?
मानव संसाधन की भारी कमी
- लाइनमैन की कमी
- संविदाकर्मियों पर निर्भरता
- सुरक्षा उपकरणों की कमी
👉 हादसे बढ़ रहे हैं
👉 फाल्ट ठीक होने में देरी
बिजली व्यवस्था में मानव संसाधनों की कमी भी एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है। विभाग में लाइनमैन और तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण फाल्ट सुधार कार्य प्रभावित हो रहा है। बड़ी संख्या में संविदाकर्मियों के भरोसे व्यवस्था चलने से सुरक्षा और कार्य क्षमता दोनों पर असर पड़ रहा है।
जिम्मेदारी तय होनी चाहिए
- क्या ऊर्जा विभाग की योजना फेल हुई?
- क्या ट्रांसमिशन सिस्टम नजरअंदाज हुआ?
- क्या भर्ती और संसाधन पर लापरवाही हुई?
या फिर
👉 सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ “दावे” किए गए?
ऊर्जा विभाग की ओर से बार-बार बेहतर प्रबंधन और पर्याप्त बिजली उपलब्धता के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्थिति फिलहाल इन दावों से मेल खाती नजर नहीं आ रही। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार और विभाग को पहले से बिजली मांग का अनुमान था तथा तैयारियों के दावे भी किए गए थे, तो फिर प्रदेश की जनता आज बिजली संकट का सामना क्यों कर रही है।








