बार-बार शिकायत के बावजूद नहीं हटा तार, तीन मासूम बच्चों के सिर से उठा पिता का साया; गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज
गोंडा (यूपी)। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में बिजली विभाग की कथित घोर लापरवाही ने एक परिवार को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। नगर कोतवाली क्षेत्र के पोर्टरगंज पथवलिया गांव में शुक्रवार सुबह हाईटेंशन लाइन का तार टूटकर 35 वर्षीय पत्रकार रंजीत तिवारी पर गिर गया, जिससे उनकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। यह हादसा न सिर्फ एक व्यक्ति की जान ले गया, बल्कि तीन मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया भी छीन ले गया।
10 साल से मौत सिर पर लटक रही थी
परिजनों के मुताबिक, रंजीत तिवारी के घर के ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन लाइन पिछले करीब एक दशक से खतरा बनी हुई थी। परिवार और ग्रामीणों ने कई बार बिजली विभाग को लिखित शिकायतें दीं, अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला—समाधान नहीं।
सुबह की चेतावनी बनी आखिरी आवाज
शुक्रवार सुबह हालात और बिगड़ गए थे। तार घर की छत के बेहद करीब आ चुका था। रंजीत ने खुद पड़ोसियों को आगाह किया कि बड़ा हादसा हो सकता है। लेकिन कुछ ही देर बाद तेज आवाज के साथ तार टूटकर सीधे उन पर आ गिरा। करंट इतना तेज था कि उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला।

यूपीपीसीएल पर बड़ा सवाल: जिम्मेदारी या लापरवाही?
इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या विभाग तब तक इंतजार करता है जब तक कोई जान न चली जाए? क्या आम नागरिक की सुरक्षा सिर्फ फाइलों तक सीमित है?
एफआईआर दर्ज, अफसरों पर शिकंजा
मृतक के भाई अमरजीत तिवारी की तहरीर पर बिजली विभाग के मुख्य अभियंता समेत पांच अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 (गैर इरादतन हत्या) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। यह कार्रवाई विभागीय लापरवाही पर एक बड़ा संकेत मानी जा रही है।
प्रशासन हरकत में, मुआवजे की मांग तेज
घटना की सूचना मिलते ही डीएम प्रियंका निरंजन और एसपी विनीत जायसवाल मौके पर पहुंचे और परिजनों को सांत्वना दी। डीएम ने मामले की जांच के लिए कमेटी गठित करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है। वहीं, आक्रोशित ग्रामीणों ने 50 लाख रुपये मुआवजा, सरकारी नौकरी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है।
एक सवाल जो रह गया—कब जागेगा सिस्टम?
रंजीत तिवारी की मौत कोई सामान्य हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता का नतीजा है। जब एक व्यक्ति 10 साल तक अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए गुहार लगाता रहे और फिर भी अनसुना कर दिया जाए—तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है।
(रिपोर्ट: तथ्यात्मक और जनहित केंद्रित)







